मुरादाबाद। महिला क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक विश्वकप जीत ने पूरे देश को उत्साहित किया है। इस जीत की चमक शहर की उन बेटियों पर सबसे ज्यादा दिख रही है जिनका सपना एक दिन इसी टीम में शामिल होकर खेलने का है। यह बेटियां क्रिकेट का नियमित रूप से अभ्यास कर रही हैं। तीन साल पहले जहां मुश्किल से चार-पांच लड़कियां क्रिकेट का प्रशिक्षण ले रही थी वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर दो दर्जन से अधिक हो गई है। खास बात यह है कि इनमें से करीब पांच से छह खिलाड़ी प्रदेशीय टीम में भी चयनित होकर शहर का नाम रोशन कर चुकी हैं।
शहर की विभिन्न क्रिकेट एकेडमियों में बेटियों के आने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। पारकर क्रिकेट एकेडमी में दो, कैलिबर क्रिकेट एकेडमी में दो, एमपीएस क्रिकेट एकेडमी में 17, रेलवे स्टेडियम में चार, साईं क्रिकेट एकेडमी में चार और सोनकपुर स्टेडियम में सात लड़कियां नियमित रूप से अभ्यास कर रही हैं। यह बेटियां सुबह से देर शाम तक प्रैक्टिस करके खुद की प्रतिभा को निखार रही हैं।
एमपीएस क्रिकेट एकेडमी में प्रशिक्षण ले रही जाह्नवी प्रजपति ने बताया कि जिस तरह लड़कों को ट्रेनिंग मिलती है उसी तरह लड़कियां भी खेल के हर क्षेत्र में प्रशिक्षण हासिल करती हैं। फिटनेस पर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, कवर ड्राइव, पुल शॉट और स्विंग बॉलिंग जैसी बारीकियों पर भी खासा ध्यान देती हैं।
सुंदुस शाकिर का कहना है कि लड़कियों को खेलने के लिए कई मोर्चों पर संघर्ष करना होता है। पहले घरवालों को राजी करना और फिर मोहल्ले व करीबी रिश्तेदारों के तानों को झेलना। पता नहीं क्यों यह यह धारणा बना ली गई है कि क्रिकेट लड़कों का खेल है। लेकिन हाल के वर्षों में लोगों को सोच कुछ बेहतर हुई है। महिला टीम के चैंपियन बनने से उम्मीद है कि स्थिति कुछ और भी बेहतर होगी।
कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी, प्रदीप टंडन और दानिश मिर्जा का कहना है कि बदलाव दिख रहा है। पहले जहां माता-पिता बेटियों को खेलने से मना करते थे वहीं अब लोग खुद ही अपनी बेटियों को लेकर मैदान पर प्रैक्टिस कराने के लिए पहुंचते हैं। हाल के वर्षों में बेटियों की न सिर्फ संख्या बढ़ी है बल्कि उन बेटियों ने अपने प्रदर्शन से खुद को साबित भी किया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि हर वर्ष प्रदेश की सब जूनियर, अंडर-16 व अंडर-19 टीम में शहर की बेटियां स्थान बना रही हैं।
- सुविधाएं मिलें तो और निखरें प्रतिभाएं
कोचों का मानना है कि अगर लड़कों की तरह लड़कियों को भी सुविधाएं मिलने लगें तो नतीजा और भी बेहतर हो सकता है। शहर में केवल लड़कों के टूर्नामेंट व मैच आयोजित होते हैं। बेटियों को नेट प्रैक्टिस के लिए लड़कों के साथ मैदान साझा करना पड़ता है। बेटियों को टूर्नामेंट और सुरक्षित वातावरण मिलने लगे तो परिणाम और भी ज्यादा अच्छे होंगे। क्रीड़ाधिकारी और क्रिकेट कोच सुनील कुमार का कहना है कि वह कोशिश करेंगे कि लड़कियों को अच्छा टूर्नामेंट और बेहतर सुविधाएं मिले।
00
- महिला टीम के चैंपियन बनने से मिला हौसला
- जब टीम को कप उठाते देखा तो ऐसा लगा जैसे मैं वहां खुद मौजूद हूं। मुझे इस जीत से बहुत हौसला मिला है। जब मैंने बल्ला उठाया तो मेरी दोस्त हंसती थी कि लड़की होकर क्या खेलोगी। अब यह सवाल कोई नहीं करता। मैं आगे बढ़ना चाहती हूं क्योंकि मुझे मालूम है कि मैं भी कर सकती हूं। मेरे परिजन कहते हैं कि तुम मेहनत करोगी तो एक दिन टीवी पर हम तुम्हारा भी मैच देखेंगे। इसी सपने को पूरा करने के लिए हर रोज पसीना बहा रही हूं। मैं एक दिन नीली जर्सी में जरूर खेलूंगी और हमारी टीम इसी तरह चैंपियन बनकर मेरी जैसी खिलाड़ियों को हौसला देगी। - नाविका, क्रिकेटर
000
महिला टीम की जीत ने कई लड़कियों को हौसला दिया है। मुझे लगता था कि यहां तक पहुंचने का रास्ता कठिन है लेकिन अब ऐसा लगता है कि मैं भी वहां तक पहुंच सकती हूं। इस वर्ल्ड कप की जीत के बाद मैंने ठान लिया है कि मैं हिम्मत न हारकर मेहनत कर यहां तक जाऊंगी। मेरे घर से खेल को हमेशा सपोर्ट मिला है। खुद घर वाले मेरे किट बैग तैयार करते हैं। घरवालों का कहना है कि मुझे देश के लिए खेलना है। इस जीत ने मुझ जैसी तमाम खिलाड़ियों को उम्मीद और ताकत दी है। हम भी एक दिन अपने शहर और देश का नाम रोशन करेंगे। - मणी, क्रिकेटर