बेशक पुलिस ने एनआईए अधिकारी तंजील अहमद हत्याकांड के मुख्य शूटर मुनीर को दबोच लिया है लेकिन कोर्ट में उसे कातिल साबित करना इतना आसान नहीं होगा। दरअसल तंजील अहमद हत्याकांड में पुलिस का कागजी वर्क बेहद लचर है। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिस का खुलासा एकदम सही और सटीक है लेकिन विवेचना में ठोस साक्ष्यों की कमी है। पुलिस ने साक्ष्य जुटाने के बजाए कुछ लोगों की गवाही को खुलासे का आधार बनाया, जो मुनीर के रिश्तेदार हैं।
2/3 अप्रैल की रात को बिजनौर के स्यौहारा थाना क्षेत्र में सहसपुर निवासी एनआईए के डिप्टी एसपी की उनके गांव के पास ही गोलियों से छलनी करके हत्या कर दी गई थी। पुलिस को इस मामले में घटना के छह - सात दिन बाद ही अहम सुराग मिल गए थे। शहरपुर के ही एएमयू छात्र मुनीर का नाम प्रकाश में आ गया था। लेकिन पुलिस के पास कोई साक्ष्य नहीं था।
सबकुछ जानने के बाद भी पुलिस असहाय थी, यही वजह थी कि घटना का खुलासा करने पहुंचे डीजीपी कमजोर साक्ष्य देख आखिरी वक्त में बिना खुलासा किए बिजनौर से लौट गए थे। आखिर में पुलिस ने मुनीर के ही दो करीबी रिश्तेदारों के कोर्ट में बयान कराए थे और फिर मुनीर को वांटेड दर्शाकर घटना का खुलासा कर दिया था।
कोर्ट में गवाही दिलाने से पहले और बाद में पुलिस ने दोनों को अपनी अभिरक्षा में रखा था। बहुत मुमकिन है कि करीबी रिश्तेदार होने की वजह से ये दोनों ही कोर्ट में मुनीर के खिलाफ गवाही देने से मुकर जाएं। वैसे भी घटना में मुनीर का नाम उजागर होने के बाद से तंजील के परिवार ने भी चुप्पी साध ली थी। ऐसे में कोर्ट में मुनीर को कातिल साबित करना पुलिस के लिए आसान काम नहीं होगा।