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Moradabad News: शहर में सात हजार टेस्ट ट्यूब बेबी... पहला बच्चा 15 साल का

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मुरादाबाद। बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव और देर से शादी का ट्रेंड अब लोगों की पारिवारिक जिंदगी पर भी असर डाल रहा है। जिले में पिछले 15 साल के भीतर सात हजार से ज्यादा बच्चे टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक यानी आईवीएफ से जन्म ले चुके हैं। पहला बच्चा अब 15 साल का हो चुका है। शहर में संचालित केवल पांच आईवीएफ सेंटरों में हर महीने 50 से 60 तक कृत्रिम गर्भाधान हो रहे हैं।
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एक समय था जब संतान न होने पर दंपती दिल्ली, लखनऊ और बड़े महानगरों के अस्पतालों के चक्कर लगाते थे। इलाज में लाखों रुपये और महीनों का समय खर्च होता था। अब मुरादाबाद में ही आधुनिक आईवीएफ सेंटर खुलने से लोगों को बड़ी राहत मिली है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले 40 से 45 साल की उम्र के दंपती आईवीएफ के लिए आते थे, लेकिन अब 28 से 35 साल के युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि मोबाइल और लैपटॉप के बीच सिमटती जिंदगी, जंक फूड, धूम्रपान, शराब, मोटापा और मानसिक तनाव युवाओं की प्रजनन क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। कई मामलों में शादी के चार-पांच साल बाद भी संतान न होने पर दंपती आईवीएफ का सहारा ले रहे हैं। एक आईवीएफ चक्र पर करीब एक लाख से 1.80 लाख रुपये तक खर्च आता है। कई बार पहली कोशिश में सफलता नहीं मिलती और दो से तीन बार प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। इसके बावजूद दंपती इसे उम्मीद की आखिरी किरण मान रहे हैं।
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केस-1
12 साल बाद घर में गूंजी किलकारी
कटघर के कारोबारी दंपती ने शादी के बाद करीब 12 साल तक इलाज कराया। दिल्ली और लखनऊ तक चक्कर लगाए, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार मुरादाबाद के एक आईवीएफ सेंटर में उपचार शुरू कराया। दूसरे प्रयास में महिला गर्भवती हुई और अब उनके घर तीन साल का बेटा है। परिवार का कहना है कि जिस खुशी की उम्मीद छोड़ चुके थे, वह आईवीएफ से मिली।



केस-2
शादी के छह साल बाद जुड़वां बच्चों के माता-पिता बने
कांठ रोड क्षेत्र के एक दंपती ने शादी के छह साल बाद जांच कराई तो पुरुष में शुक्राणुओं की कमी सामने आई। डॉक्टरों ने आईवीएफ की सलाह दी। करीब चार महीने इलाज के बाद महिला गर्भवती हुई और उसने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। अब परिवार दूसरे दंपतियों को भी समय रहते जांच कराने की सलाह देता है।



केस-3
करिअर के बाद मां बनने का फैसला

शहर की एक बैंक अधिकारी ने 42 साल की उम्र में आईवीएफ के जरिये मां बनने का फैसला लिया। लंबे समय तक नौकरी और करिअर पर ध्यान देने के कारण दंपती ने परिवार बढ़ाने में देरी कर दी थी। प्राकृतिक रूप से गर्भधारण न होने पर आईवीएफ कराया गया और पिछले साल महिला ने बेटी को जन्म दिया।




क्या है आईवीएफ, कैसे होती है प्रक्रिया
स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीषा जैन के मुताबिक महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु लिए जाते हैं। लैब में दोनों को मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है। तैयार भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। करीब 14 दिन बाद गर्भ ठहरने की जांच होती है। पूरी प्रक्रिया डॉक्टरों की निगरानी में कई चरणों में पूरी होती है। इसमें विशेषज्ञों की जरूरत होती है।

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डॉक्टरों के वर्जन (फोटो)
अब बांझपन सिर्फ अधिक उम्र की समस्या नहीं रह गया है। 30 साल से कम उम्र के दंपती भी बड़ी संख्या में आईवीएफ के लिए आ रहे हैं। तनाव, मोटापा, धूम्रपान, शराब और अनियमित दिनचर्या इसका बड़ा कारण बन रहे हैं। शुरुआती जांच बेहद जरूरी है। 12 साल से मैं महिलाओं में इस प्रक्रिया को कर रही हूं।
- डॉ. मनीषा जैन, आईवीएफ विशेषज्ञ


पहले लोग समाज के डर से इलाज छिपाते थे, लेकिन अब जागरूकता बढ़ी है। तकनीक बेहतर होने से सफलता दर भी बढ़ी है। सही समय पर इलाज शुरू हो तो अधिकतर दंपतियों को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। देरी करने से समस्या और जटिल हो जाती है।
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- डॉ. शुभ्रा अग्रवाल, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ
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