28 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो रहा है। श्रद्धा भाव के साथ तर्पण करने से पितृ प्रसन्न होंगे। अपनों पर आशीर्वाद की वर्षा करेंगे। पितृ पक्ष में पितृ गण धरती पर आ जाते हैं। ऐसा कोई कार्य पितृ पक्ष में नहीं करना चाहिए जिससे पितृ नाराज हों। ब्राह्मण, जमाता, भांजा, मामा, गुरु और नाती को भोजन कराने से पितृगण प्रसन्न होते हैं।
भोजन बनने पर सबसे पहले भोजन का एक हिस्सा गाय, कुत्ता, कौआ को खिलाना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें खिलाया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त होता है। पितृ पक्ष में दरवाजे पर आने वाले जीव जंतु को मारना नहीं चाहिए। पंडित केदार मुरारी के अनुसार दरवाजे पर आने वाले जीव जंतु को उसकी पसंद का भोजन देने का प्रयास करें।
पीने के लिए पानी दें। ब्राह्मणों को भोजन कराते समय भोजन का पात्र दोनों हाथ से पकड़कर लाना चाहिए। एक हाथ से पात्र पकड़ने पर भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर ल ेते हैं। इससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।
इस तरह करें श्राद्ध- - आश्विन कृष्ण प्रतिपदा: नाना नानी के घर कोई न हो। उनकी मृत्यु की तिथि याद न हो तो इस तिथि को उनका श्राद्ध कर सकते हैं।
- पंचमी: जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाता है
- नवमी: सौभाग्यवती होते हुए जिस स्त्री की मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है। माता के श्राद्ध के लिए भी यह तिथि उत्तम मानी गई है। इसे मातृनवमी भी कहा गया है। मान्यता है कि इस तिथि में श्राद्ध से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।
- एकादशी और द्वादशी: जिन्होंने सन्यास लिया है उनका श्राद्ध किया जाता है।
- चतुर्दशी: शस्त्र, आत्महत्या, विष, दुर्घटना से जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है।
- कृष्ण पक्ष त्रयोदशी: बच्चों का श्राद्ध करने का विधान है।
- सर्व पितृमोक्ष अमावस्या: किसी वजह से पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, अथवा पिृत तिथि याद नहीं है तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार इस दिन श्राद्ध से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ उनका भी अमावस्या तिथि पर ही श्राद्ध किया जाना चाहिए।