मार्केट में ब्लैक मनी का संचालन बंद होने से रीयल एस्टेट की कमर टूट गई है। बिल्डर तो परेशान हैं ही अब अफसरों के लिए भी ये मंदी परेशानी का सबब बन गई है। स्टांप एवं निबंधन का टारगेट पूरा करना अफसरों के लिए टेढ़ी खीर बन गया है।
जिले में रजिस्ट्री से 340 करोड़ रुपये सालाना इकट्टा करने का टारगेट अफसरों को मिला है, लेकिन अधिकारी अभी आधे तक भी नहीं पहुंच सके हैं। नवंबर में नोटबंदी के बाद से ही रीयल एस्टेट मंदी की मार झेल रहा है।
दरअसल नोटबंदी से पहले प्रापर्टी की खरीद फरोख्त में बड़े पैमाने पर ब्लैक मनी का इस्तेमाल हो रहा था। बिल्डर फ्लैट की आधी कीमत या उससे भी अधिक नंबर दो (ब्लैक मनी) में ले लेतेे थे जबकि बाकी रकम नंबर एक में ली जाती थी।
इसके चलते नेता और ब्यूरोक्रेट्स अपनी काली कमाई का बड़ा हिस्सा प्रापर्टी में ही इंवेस्ट कर रहे थे। लेकिन अब नोटबंदी के बाद बाजार में ब्लैक मनी का प्रचलन काफी घट गया है। बिल्डर भी अब खरीदारों से नंबर एक में ही पेमेंट मांग रहे हैं।
यदि ब्लैक मनी का इस्तेमाल है भी तो वो घटकर पांच से दस फीसदी ही रह गया है। ऐसे में रीयल एस्टेट की कमर टूट गई है। रजिस्ट्रयां कम होने से अधिकारी भी परेशान हैं। गुरुवार को डीएम ने कर करेत्तर की समीक्षा की तो स्टांप एवं निबंधन विभाग सबसे फिसड्डी निकला।
टारगेट का पचास फीसदी भी पूरा नहीं कर पाने पर डीएम ने नाराजगी जताई है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले साल की तुलना में नोटबंदी के बाद से हर माह करीब एक हजार रजिस्ट्री कम हो रही हैं।