असत्य पर सत्य की विजय, बुराई
पर अच्छाई की जीत के लिए मनाया जाने वाले पर्व विजयदशमी को ही रामलीला का
अंत मान लिया जाता है। लेकिन केवल रामकथा यहीं समाप्त नहीं होती। अपनी
पत्नी को ससम्मान वापस लाना राम का कर्त्तव्य था।
इसके बाद
पुत्रों का पालन पोषण, प्रजा का पालन, राज्य का संचालन और सभी को न्याय।
असल में रामकथा यहीं से शुरू होती है। एक मनघडंत आरोप लगाकर समाज से
तिरस्कृत की गई अहिल्या को दोबारा समाज में सम्मान दिलाना राम का कार्य था।
यह एक नेतृत्वकर्ता और राजा का गुण हैं।
इसी प्रकार एक मित्र,
पुत्र, पिता, पति, भाई, दामाद, शत्रु सभी के कर्त्तव्य निभाए। उनके जीवन से
सीख मिलती है। एक बड़ा सत्य ये है कि रामायण मेें केवल राम ही नहीं हर एक
चरित्र मनुष्य को शिक्षा देता है। यहां तक की जिस रावण को हेय दृष्टि से
देखा जाता है वह भी हमें शिक्षा देता है।
आज जब पूरा विश्व
विजयदशमी का पर्व मना रहा है, तब यह समझना जरूरी है कि हमें किस पर विजय
चाहिए और कैसी विजय चाहिए। किस रावण का अंत करना चाहते हैं इस विजयदशमी पर।
राम ने नहीं किया था सीता का त्याग
मुरादाबाद।
सीता को वापस अयोध्या लाने के बाद राम ने एक व्यक्ति के कहने पर सीता का
त्याग कर दिया। लेकिन मूल रामकथा में ऐसा कहीं नहीं है। हिन्दी के
प्राध्यापक डा. मुकेश गुप्ता कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित
मानस हो या फिर नरेंद्र कोहली की रामकथा या प्राचीन वाल्मीकि रामायण, इन
सभी में यह अंश नहीं है। कालांतर में विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा रामकथा
के महत्व को कम करने के लिए एक प्रक्षिप्त अंश जोड़ा गया। जबकि मूल रामकथा
में यह अंश कहीं नहीं मिलता। विद्वान चिंतक इसका समर्थन नहीं करते।
"केवल
रावण का अंत हो जाना ही रामलीला का अंत नहीं है। इसके बाद एक राजा के रूप
में प्रजा को कैसे पाला जाए यह रामलीला का मुख्य विषय है। सीता तक पहुंचने
के लिए राम ने जिन पड़ावों को पार किया उस मध्य किए गए कार्य ही राम के
चरित्र को दर्शाते हैं। वर्तमान परिवेश में भी हम रामलीला के प्रसंगों की
शिक्षाओं को नकार नहीं सकते। देश भर में हम रामलीला के उन अनछुए और तार्किक
प्रसंगों को रख रहे हैं जो अब तक कहानियों में नहीं छुए जा रहे थे। रामकथा
में हर बार कुछ नया मिलेगा।" -डा. पंकज दर्पण अग्रवाल, निर्देशक,
कार्तिकेय सांस्कृतिक संस्था।
"रामकथा अनंत है। एक वाक्य में कहें
तो शून्य से प्रारंभ कर देवत्व तक की यात्रा का नाम है राम। रावण के चरित्र
से भी आप शिक्षा ले सकते हैं। सीता के चरित्र से आजकल की स्त्रियों को
शिक्षा लेनी चाहिए। पुरुषों के लिए राम एक आदर्श चरित्र हैं। लक्ष्मण और
उर्मिला जैसे गूढ़ पात्रों को भी हम नहीं छोड़ सकते। सही मायने में समरसता
को स्थापित करने का उदाहरण है रामकथा।" -डा. मुकेश गुप्ता, असिस्टेंट
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, एमएच कॉलेज।