ड्राइविंग लाइसेंस बनवानेे की प्रक्रिया बदलती चली गई। पेपर पर बनने वाला डीएल पहले बुकलेट और अब कार्ड में बदल गया। फर्जीवाड़ा रोकने के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम कर दी गई। लेकिन कर्मचारियों की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं आया।
लंबी प्रक्रिया के बाद आवेदक डीएल की सभी औपचारिकता पूरी कर इस उम्मीद के साथ घर चला जाता है कि जल्द ही डाक के जरिए उसे डीएल मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी आवेदकों को महीनों आरटीओ आफिस का चक्कर लगाना पड़ता है। इसकी वजह कर्मचारियों की लापरवाही है।
डीएल आरएफडी (रिकार्ड फुल डाटा) रूम से अप्रूवल के बीच गुम हो जा रहे हैं। जबकि दोनों कमरों के बीच सिर्फ एक कमरे का फासला है। जो महज पांच मीटर की दूरी पर है। रोजाना आठ से दस आवेदक घर पर डीएल नहीं पहुंचने की शिकायत लेकर आरटीओ कार्यालय पहुंच रहे हैं।