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नेताओं का नारा, खाली प्लाट हमारा

Tue, 12 Jul 2016 11:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
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कब्जे के मामले
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खबरदार! आपका प्लाट कहीं खाली पड़ा है तो बाउंड्री कराकर दरवाजा चढ़ा दीजिए। वरना किसी दिन ढूंढते रह जाएंगे। शहर के हर खाली प्लाट पर सपा नेताओं की नजरें गढ़ी हैं। मुमकिन है कि किसी दिन आपके प्लाट पर नेताजी का झंडा नजर आए। फिर न तो पुलिस आपके सुनेगी न प्रशासन। वजह साफ है, इनमें से कुछ सत्ता के दबाव में हैं तो बाकी नेताओं के खेल के हिस्सेदार।
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सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक नहीं कई बार कहा है कि उनकी पार्टी के नेता पब्लिक की समस्याएं सुलझाने के बजाए पब्लिक की जमीनें कब्जाने में लगे हैं। उनकी चिंता जायज है। 2017 सिर पर खड़ा है और नेताओं की ये हरकतें चुनाव में पार्टी की लुटिया डुबो सकती हैं। लेकिन नेता बेफिक्र हैं। रही सही कसर पुलिस और तहसील के कुछ अफसर पूरी कर दे रहे हैं। शहर में जमीनों पर कब्जों के मामलों में आए दिन सपा नेताओं का नाम उछल रहा है। इनमें सपा के कुछ विधायक भी शामिल हैं। 

कभी मदरसे की जमीन बेचने में सपा नेताओं का नाम आता है तो कभी निगम की जमीन कब्जाने में। पब्लिक के प्लाट को तो नेताजी अपनी खानदानी जागीर समझकर कब्जा कर रहे हैं। दुकान - मकान पर कब्जा कराने से लेकर किराएदारों से प्रापर्टी खाली कराने तक के रेट तय हैं। जमीन के विवादों में पिछले एक साल में पांच सौ से अधिक मुकदमे लिखे गए हैं।
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विवाद पैदा करके होती है ‘सत्ता टैक्स’ की वसूली - मुरादाबाद। पहले जमीनों पर विवाद पैदा किया जाता और फिर होती है ‘गुंडा टैक्स’ की वसूली। इस काम को अंजाम देने के लिए पूरा रैकेट है जो शहर में बेहद व्यवस्थित ढंग से चलाया जा रहा है। सपा के कद्दावर नेता पर्दे के पीछे से इसे आपरेट कर रहे हैं जबकि खुले तौर पर उन्होंने अपने सिपहसलारों को आगे कर रखा है। पुलिस के बगैर काम नहीं चलता लिहाजा नेताओं ने इस रैकेट में अपने मिजाज के पुलिस वालों को भी मिला रखा है।

कुछ लेखपाल खास तौर पर टीम में होते हैं जो जमीन की पूरी कुंडली निकालकर बताते हैं कि उसमें कदम कहां से रखा जाए। इसके बाद जमीन के फर्जी कागज तैयार कराए जाते हैं और फिर पुलिस की मदद से जमीन पर कब्जा करने पहुंच जाते हैं। जमीन का असल मालिक आता है तो पुलिस दूसरी पार्टी पर भी कागज होने की बात कहकर दोनों को थाने बुला लेेती है।

स यहीं से सौदेबाजी का खेल शुरू होता है। जमीन के मालिक को सलाह दी जाती है कि सिविल के मामले सालोंसाल चलेंगे लिहाजा जमीन की 20- 30 फीसदी कीमत देकर समझौता कर ले। कई बार केस मैच्यौर नहीं होता है तो दबाव बनाने के लिए असल मालिक पर दूसरी पार्टी की तहरीर लेकर पुलिस मुकदमा भी ठोंक देती है।
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