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पीयूष चावला का स्वर्णिम सफर: पीतल नगरी से निकला सोना, जुनून और संघर्ष से पाई मंजिल... अब क्रिकेट को कहा अलविदा

Sat, 07 Jun 2025 06:43 PM IST
विमल शर्मा मशाहिद अब्बास, अमर उजाला मुरादाबाद

सार

मुरादाबाद के सोनकपुर स्टेडियम की साधारण मिट्टी वाली पिच से शुरुआत करने वाले पीयूष चावला ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा की। पीयूष दो विश्व कप विजेता भारतीय टीमों (2007 टी-20 और 2011 वनडे) का हिस्सा रहे। 2011 विश्व कप में उन्होंने तीन मैचों में चार विकेट लिए। साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले पीयूष ने अपने कोच केके गौतम के मार्गदर्शन में कड़ा अभ्यास कर 17 साल की उम्र में टेस्ट डेब्यू किया था। 
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किक्रेटर पीयूष चावला - फोटो : PTI
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विस्तार
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मिट्टी की पिच पर मैट बिछाकर घंटों पसीना बहाने वाले शहर के एक लड़के ने आज जब क्रिकेट को अलविदा कहा तो उनके नाम कई रिकाॅर्ड हैं। उनका नाम क्रिकेट इतिहास में दो विश्वकप जीतने वाली टीम के खिलाड़ी के रूप में दर्ज है। मुरादाबाद की गलियों से निकलकर विश्वकप की ट्राॅफी थामने वाले पीयूष ने अपने जुनून व संघर्ष से यह मुकाम हासिल किया। 

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वह नजारा कोई नहीं भूल सकता जब भारत ने 2011 में विश्वकप जीता था और मुरादाबाद का बेटा नीली जर्सी में तिरंगे के साथ खड़ा था। इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सपनों की तपिश की लंबी दास्तां है।

अब, जब उन्होंने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास का एलान किया, तो शहर के खेल प्रेमियों की आंखें नम हो गईं। गर्व और भावुकता, दोनों भाव साथ हैं। पीयूष चावला ने क्रिकेट की शुरुआत सोनकपुर स्टेडियम की साधारण सी मिट्टी वाली पिच से की थी। यहां कोई टर्फ विकेट नहीं था, सुविधाएं नहीं थीं, बस जुनून था।

मैदान में मैट बिछाई जाती थी और उसी पर पीयूष घंटों अभ्यास करते थे। कोच केके गौतम ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें तराशना शुरू किया। जब कोच का ट्रांसफर अलीगढ़ हुआ तो पीयूष ने भी शहर छोड़ दिया और अपने गुरु के पीछे अलीगढ़ का रुख किया। कई वर्ष तक वहां प्रशिक्षण लेने के बाद जब वह शहर लौटे तो उनके भीतर एक स्पिनर आकार ले चुका था। 

साधारण परिवार से आने वाले पीयूष का सपना बड़ा था। कठिनाइयों से घिरे रास्तों से होते हुए उन्होंने भारत की अंडर-19 टीम में जगह बनाई और फिर मार्च 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया। उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 17 वर्ष और 75 दिन थी। पीयूष चावला की कहानी हर उस युवा के लिए उम्मीद है, जो छोटे शहर में रहकर बड़े सपने देखता है। 

पीयूष चावला 2007 में साउथ अफ्रीका में आयोजित पहले टी-20 वर्ल्ड कप की विजेता भारतीय टीम का हिस्सा थे। हालांकि, उन्हें इस टूर्नामेंट में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला था। इसके बाद पीयूष 2011 में भारत में आयोजित आईसीसी वनडे विश्वकप विजेता टीम का भी हिस्सा बने। इस टूर्नामेंट में उन्होंने तीन मैच खेले और चार विकेट हासिल किए थे।

आईपीएल में बनाया था केकेआर को चैंपियन 
 पीयूष चावला अपने जीवन के कुछ यादगार मैचों में से एक मैच केकेआर को आईपीएल ट्रॉफी दिलाने को भी मानते हैं। एक जून 2014 को खेले गए आईपीएल फाइनल मैच में केकेआर का मैच किंग्स इलेवन पंजाब से हुआ था। इस मैच में केकेआर को जीत के लिए अंतिम ओवर में छह रन चाहिए थे। पीयूष ने चौका मारकर टीम को चैंपियन बनाया था। पीयूष आईपीएल में केकेआर के अलावा किंग्स इलेवन पंजाब, चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के लिए भी खेले।

दानिश ने दीं शुभकामनाएं
मैं हॉकी खेलता था। पीयूष भैया का जूनियर टीम में चयन हुआ था तो उनकी खबर अखबार में छपी थी। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी क्रिकेट खेलना शुरू किया। डिस्ट्रिक्ट लेवल पर कई बार उनके साथ मैच खेला। पिछले साल यूपी टी-20 लीग में उनके साथ नोएडा की टीम के लिए खेलने का मौका मिला था। वह हम सभी नए खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके आगे के कॅरिअर के लिए उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। - दानिश मिर्जा, क्रिकेटर

मुरादाबाद का जताया विशेष आभार 
पीयूष चावला ने अपने शहर मुरादाबाद का भी दिल से आभार जताया है। संन्यास की घोषणा के बाद अमर उजाला के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि इस शहर ने हमेशा उन्हें सम्मान दिया है। वह कोई भी टूर्नामेंट जीतकर लौटे हों या फिर हारकर, इस शहर से हमेशा ही प्यार मिला है। शहर ने हमेशा अपनेपन का अहसास दिलाया है। वह चाहते हैं कि शहर से और भी खिलाड़ी निकलें और भारत के लिए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें। 
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पीयूष चावला के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है। डीएसए के माध्यम से ही वह लगातार विभिन्न मंचों पर आगे बढ़ते रहे हैं, इसलिए उनके संघर्ष को बहुत करीब से महसूस कर सकता हूं। खुशी है कि अभी उन्हें कमेंट्रेटर के रूप में देखते रहेंगे। वह शहर की पहचान हैं। - विजय गुप्ता, सचिव, डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन

पीयूष जितने अच्छे खिलाड़ी हैं, उतने ही अच्छे इन्सान भी हैं। वह जब भी शहर आते हैं तो नए क्रिकेटरों को किट, ड्रेस, गेंद और बल्ला तोहफे के रूप में देते हैं। पीयूष चाहते हैं कि इस शहर से और भी प्रतिभाएं निकलें। शहर से निकलकर पहचान स्थापित करने के बाद नई पीढ़ी के लिए सोचना बड़ी बात है। उन्हें आगे की पारी के लिए शुभकामनाएं। -बदरुद्दीन सिद्दीकी, क्रिकेट कोच

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