मुरादाबाद। दिसंबर-जनवरी माह की कड़ाके की सर्दी। कभी बस तो कभी पैदल ही गांव तक का सफर। रात के अंधेरे में गांव के रास्ते पर चलना। वाकई कविता देवी ने बेटी को कुश्ती चैंपियन बनाने के लिए दुश्वारियों के अखाड़े में रोज लड़ाई लड़ी। मगर अब जब बेटी का चयन दिल्ली में होने वाली 69वीं राष्ट्रीय स्कूल खेल प्रतियोगिता में कुश्ती के लिए हुआ तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रह गया है।
दिव्या की मां कविता आंगनबाड़ी में सहायक कार्यकर्ता हैं। जबकि पिता विनोद कुमार मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। तीन बहनें और एक भाई में दूसरे नंबर की दिव्या ने दो साल पहले कुश्ती खेलना शुरु किया था। इसको लेकर कविता को लोगों से ताने तक सुनने पड़े। लोग कहते थे कि यह तो पुरुषों का खेल है। लेकिन मां कविता अपनी बेटी दिव्या का हौसला बढ़ाती रहीं। कोच संजीव चौधरी भी जीत का जुनून जगाते थे। इसकी बदौलत दिव्या ने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद संजीव चौधरी का ट्रांसफर मूंढापांडे में हो गया। इसके बाद दिव्या की प्रैक्टिस रुक गई। इसी बीच दिव्या का चयन दिल्ली में होने वाली प्रतियोगिता के लिए हो गया था। बेटी को जब स्कूल स्तर पर संसाधन नहीं मिले तो मां कविता ने सोनकपुर स्टेडियम में प्रैक्टिस करवाने का निर्णय लिया। वह बेटी को लेकर मुरादाबाद आने लगीं। कभी बस तो कभी पैदल भी सफर किया।
शिक्षिका स्वयं खेलती थीं कुश्ती
प्रभारी प्रधानाध्यापक सुनीता रानी ने बताया कि लड़कियों की झिझक निकालने के लिए उनके साथ खुद खेलना पड़ा। दिव्या की प्रैक्टिस के लिए स्कूल में गद्दे मंगवाए गए थे। शिक्षक अनिरुद्ध प्रताप सिंह अभ्यास करवाते थे। सोनकपुर स्टेडियम में और बेहतर संसाधन मिल सकें, इसके लिए स्कूल की छुट्टी से आधा घंटा पहले दिव्या को मुरादाबाद भेजा जाता था। मां कविता शाम चार बजे तक स्टेडियम पहुंचती थीं। शाम छह बजे तक प्रैक्टिस होती थी। इसके बाद रात को आठ या नौ बजे तक घर पहुंचती थी। कविता ने बताया कि तीनों बच्चों के लिए रात का खाना दोपहर में ही बना देती थीं, ताकि बेटी की प्रैक्टिस पर कोई व्यवधान न आए। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विमलेश कुमारी और खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि दिव्या एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी है।