मिर्जा असद उल्ला खां गालिब उर्फ मिर्जा गालिब, शायरी की दुनिया में वो नाम जो दशकों बाद भी लोगों के दिलों में राज करता है और शायरी की श्रेष्ठ बुलंदी पर रोशन है। मिर्जा गालिब केवल शायर ही नहीं बल्कि एक अच्छे शिक्षक भी थे और उनके गुरु रूप का ही रामपुर की सरजमीं से नाता है क्योंकि मिर्जा गालिब रामपुर के शासक रहे नवाब यूसुफ अली खां के शिक्षक रहे हैं।
मिर्जा गालिब 1860 के आसपास रामपुर आए और यहां पर उस वक्त की रियासत के शासक नवाब यूसुफ अली खां के शिक्षक के दायित्व निभाए। इसके बदले उन्हें प्रतिमाह सौ रुपये बतौर वजीफा दिया गया। इसके बाद नवाब कल्बे अली के भी शिक्षक रहे। उन्हें राजद्वारा में एक मकान भी रहने को दिया गया था। कई बार रामपुर आने पर वह शाही महल खासबाग के मेहमान भी बने।
कुछ साल बाद दिल्ली चले गए, लेकिन रामपुर के नवाबों से पत्राचार के माध्यम से संपर्क में लगातार बने रहे। उनके करीब 150 पत्र आज भी विरासत के रूप में उपलब्ध हैं। नवाब कल्बे अली खां शायर नहीं थे, लेकिन मिर्जा गालिब उनके भी संरक्षक रहे। मिर्जा गालिब ने अपनी कलम से कोसी नदी के मीठे पानी और रामपुर के शानदार भोजन की प्रशंसा की थी। उन्होंने अपने कई लेखों में मिर्जा गालिब और रामपुर के रिश्ते को उजागर किया है।
मिर्जा गालिब के रामपुर से रिश्ते और उनके साहित्य को आज भी रजा लाइब्रेरी में सहेजा हुआ है। मिर्जा गालिब के साहित्य पर शोध करने वाले छात्र यहां आते रहते हैं। पूर्व मंत्री नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां कहते हैं कि नवाबों ने हमेशा कला और संस्कृति का सम्मान किया। चाहे मिर्जा गालिब हों या फिर बिरजू महाराज सभी को रियासत से पूरा मान सम्मान दिया गया। रामपुर रियासत के समय में मिर्जा गालिब रामपुर आए और उन्हें नवाब परिवार से पूरा सम्मान मिला, जिस कारण उनके रामपुर से इतने गहरे रिश्ते रहे।