रियल एस्टेट की मंदी से बिल्डर तो परेशान हैं ही, एमडीए और आवास विकास भी जूझ रहा है। नौबत ये है कि आवास विकास को तो फ्लैट्स बेचने के लिए शहर में फेरी तक लगानी पड़ रही है। रिक्शा पर पोस्टर चिपकाकर लाउडस्पीकर से आवाज लगाई जा रही है... फ्लैट ले लो फ्लैट।
दीवारों पर पोस्टर चस्पा किए जा रहे हैं और पब्लिक को पम्पलेट भी बंटवाए जा रहे हैं। उफ! ये भी दिन देखने थे...। आवास विकास के अफसर शायद यही सोचकर माथा पकड़ रहे होंगे। कभी आवेदकों की लंबी कतार होती थी और आवास विकास के कारिंदों को आवेदकों से सीधे मुंह बात तक करना गवारा नहीं था।
लाटरी की मारामारी से लेकर नीलामी की ऊंची बोलियाें तक पब्लिक सपने का घर पाने के लिए छटपटाती थी। लेकिन रियल एस्टेट की मंदी ने आवास विकास अफसरों तक को हिलाकर रख दिया है। कभी पब्लिक अखबार में विज्ञापन आने का इंतजार करती थी।
लेकिन आज नौबत ये है कि अखबारों के विज्ञापन देने के बाद आवास विकास को फेरी लगवानी पड़ रही है। दीवारों पर पोस्टर चस्पा करने के साथ ही भीड़भाड़ वाले इलाकों में पब्लिक के बीच पम्पलेट बंटवाने को मजबूर है।
लेकिन रियल एस्टेट की मंदी के चलते फ्लैट्स को वैसा रिस्पांस नहीं मिल रहा है जैसा कभी आवास विकास की दूसरी योजनाओं को मिलता था। रियल एस्टेट में मंदी के चलते बिल्डर भी अपने फ्लैट़स नहीं बेच पा रहे हैं। एमडीए तो अपने दो हजार फ्लैट्स / घर बेचने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।