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शहीद दिवस पर विशेष - शहीद-ए-आजम हैं तो ‘शहीद’ क्यों नहीं 

Wed, 23 Mar 2016 01:54 PM IST
अभिनव चौहान / मुरादाबाद ब्यूरो
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
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मुरादाबाद के बाशिंदे भगत सिंह को शहीद घोषित करवाने को याचिका डालने की तैयारी में
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हवा में रहेगी मेरे ख्याल की खुशबू, ये मुश्ते-खाक फानी (शरीर नश्वर ) है, रहे, रहे न रहे । ये शेर उसी गजल का आखिरी शेर है जो भगत सिंह ने अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखे पत्र में लिखा था। पत्र फांसी से 20 दिन पूर्व तीन मार्च 1931 को लिखा गया था। लेकिन इस शेर की पहली पंक्ति हकीकत न बन सकी।

आजादी के 65 साल बाद भगत सिंह को याद करने वाले भले ही लाखों लोग हों लेकिन उनकी विचारधारा को समझने वाले कुछ चंद लोग हैं जो आज भी भगत सिंह और अन्य शहीदों पर लगाए आरोपों को गलत साबित कराने के लिए प्रयासरत हैं। हिंदुस्तान ही नहीं, पाकिस्तानियों की नजर में भी भगत सिंह शहीद-ए-आजम और आजादी के महानायक हैं।
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अगर तकनीकी रूप से देखा जाए तो कागजों में लाहौर षड्यंत्र केस के फैसले के मुताबिक भगत सिंह और उनके साथी अराजक और अंग्रेजी हुकूमत की परिभाषा में ‘राजद्रोही’ ही हैं।  शहादत के 85 साल और आजादी के 68 साल बाद भी सरकारी दस्तावेजों में उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया। किसी भी सरकार ने यह कलंक धोने की कोशिश नहीं की।

हाल ही में लाहौर कोर्ट पाकिस्तान में भगत सिंह बनाम द किंग एम्परर मुकदमे पर पुनर्विचार की याचिका डाली गई। भारत में भी भगत सिंह को शहीद का दर्जा दिलाए जाने की मांग तो पहले से थी, अब मुरादाबाद नागरिक समाज के कार्यकर्ता भगत सिंह मुकदमे पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर करने की तैयारी कर चुके हैं। इस सिलसिले में बुधवार को भगत सिंह के शहीदी दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट में लाहौर षड्यंत्र केस में पुनर्विचार याचिका की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
  इस मामले में मिली सजा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार के डीएसपी जेपी सांडर्स की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। जबकि आईपीसी के मुताबिक हत्या के लिए धारा 302 के स्थान पर आईपीसी की धारा 307, एक्सपोसिव सब्सटेंस एक्ट और आईपीसी की धारा 121, 121ए, 122, 123 राजद्रोह की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें से किसी भी धारा में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है। लेकिन स्पेशल ट्रिब्यूनल के तीन जजों जीसी हिल्टन, जेके टैप्प और अब्दुल कादिर की पीठ ने अक्टूबर 1930 को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 
  इसलिए गलत था फैसला ट्रिब्यूनल को तत्कालिक गर्वनर जनरल इरविन ने अध्यादेश लाकर गठित किया था। 1 मई 1930 को अध्यादेश लाया गया जिसकी अवधि एक वर्ष की थी। एलसीसी अध्यादेश संख्या-03, 1930 के नाम से इसके पारित किया गया। यह अध्यादेश डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1915 के सेक्शन 72 के माध्यम से लाया गया जो गवर्नर को असीमित शक्ति प्रदान करता था।

1915 में इस एक्ट को गदर पार्टी के विद्रोह के बाद बनाया गया जिसका पहली बार प्रयोग भगत सिंह और उनके साथियों के ऊपर ही किया गया। इस ट्रिब्यूनल को प्रिवी कौंसिल और केंद्रीय केबिनेट की ओर से कोई मान्यता नहीं थी। इस ट्रिब्यूनल को यह अधिकार दिए गए थे कि वह आरोपियों की गैरमौजूदगी में भी अपना फैसला सुना सकता था। इसी अधिकार का पालन करते हुए तीन जजों की पीठ ने जेल में एक संदेशवाहक भेजकर भगत सिंह और साथियों को बता दिया कि उन्हें फांसी की सजा निर्धारित की जाती है। 
  क्या उच्चतम न्यायालय में दायर हो सकती है याचिका  अध्यादेश के माध्यम से ट्रिब्यूनल को अंतिम अपीलिंग बॉडी का अधिकार दिया गया था। इसके बाद केवल प्रिवी कौंसिल में ही  अपील की जा सकती थी। चूंकि मौजूदा समय में दिल्ली का भी हाईकोर्ट लाहौर ही था। इसलिए इस मामले की सुनवाई लाहौर  कोर्ट में की गई थी। इस मामले में प्रिवी कौंसिल में याचिका दायर की जा चुकी है। इसके बाद अब लाहौर में याचिका को स्वीकार  कर लिया गया है। इसका ट्रायल शुरू किया जाना है।
 - प्रोफेसर जगमोहन सिंह, शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भांजे।    भगत सिंह मामले में सुनवाई का पूरा अधिकार भारत के उच्चतम न्यायालय को है। 1935 भारत सरकार अधिनियम के बाद  प्रिवी कौंसिल का क्षेत्राधिकार फेडरेल कोर्ट यानि संघीय न्यायालय को हस्तांतरित हो गया। 1947 एक्ट के बाद यह सभी  अधिकार सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पास आ गए। अब प्रिवी कौंसिल का कोई क्षेत्राधिकार भारत में नहीं है। इसलिए भगत सिंह  के केस को सुप्रीम कोर्ट मेें पुनर्विचार के लिए सुना जा सकता है।
 - प्रोफेसर हरबंश दीक्षित, कानूनविद।
शहीद का दर्जा देने में क्या दिक्कत अन्ना कोर कमेटी के सदस्य बिलारी निवासी राकेश रफीक कहते हैं कि भारत सरकार यदि इच्छाशक्ति दिखाए तो शहीद का दर्जा देने में कोई अड़चन नहीं आएगी। कानूनी पक्ष पर हम इस बात का हवाला देकर जरूर शहीद का दर्जा देने में हिचक सकते हैं क्योंकि तीनों शहीदों को कोर्ट में दोषी करार दिया है। उन पर राजद्रोह के मुकदमें थे। चूंकि हम राष्ट्रमंडल के सदस्य हैं तो परोक्ष रूप से आज भी कहीं न कहीं ब्रिटेन क्राउन का हम पर अधिकार है। इसलिए शहीद का दर्जा दिए जाने में एक कानूनी पेंच फंस सकता है। किन्तु भारत सरकार यदि कोशिश करते तो शहीद का दर्जा दिए जाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। 
  रोल ऑफ ऑनर एक्ट है जरूरी विश्व के तमाम आजाद राष्ट्रों में रोल ऑफ ऑनर एक्ट या परंपरा के आधार पर अपने वीरों को शहीद का दर्जा दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, अमेरिका जैसे राष्ट्रों में यह व्यवस्था है। यदि भारतीय संसद चाहे तो रोल ऑफ ऑनर एक्ट का बिल सदन में लाकर उसे पारित करा सकती है। इसके बाद 1757 से लेकर 1947 तक अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़ने वाले भारतीय सपूतों को अधिकृत शहीद का दर्जा दिया जा सकेगा।
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  सपना जो अधूरा रह गया ...
साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छुपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं, कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। .... दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चे के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि उस क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
आपका साथी
भगत सिंह।
(22 मार्च 1931 को लिखे भगत सिंह के लिखे आखिरी पत्र का अंश)
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