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हीनभावना का परित्याग कर हिंदी को बनाएं स्वाभिमान

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मुरादाबाद।
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हिंदी के प्रति हमारे मन में जो हीनभावना है, उसका परित्याग कर स्वाभिमान से जीएं। इसके बाद ही हिंदी भाषा का विकास और देश की उन्नति संभव है। संस्कृत देव भाषा है और हिंदी उसकी पुत्री है। इसलिए जो सम्मान संस्कृत को मिलता है, वही हिंदी को मिलना चाहिए। यह वक्तव्य गुरुवार को अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत हुए वेबिनार में वक्ताओं ने कहे। प्रबुद्ध वर्ग से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि हिंदी के विकास के लिए स्थानीय बोलियों को भी प्राथमिकता देनी होगी। हिंदी सागर की भांति है, जिसमें स्थानीय बोलियां नदियों की तरह गिरकर उसे समृद्ध करती हैं।
वेबिनार में वक्ताओं ने कहा कि हिंदी आत्मा, प्राण, स्वाभिमान सभी की भाषा है। हिंदी से जुड़ना और इसकी साधना करना ऐसा है, जैसे कोई मन मांगी मुराद मिल गई हो। हमें सपने हिंदी में आते हैं। मां दुलार भी हिंदी में ही करती है। प्यार, मनुहार, क्रोध सब हिंदी में है। हिंदी को जब तक आत्मा की भाषा नहीं मानेंगे, तब तक अधूरा महसूस करते रहेंगे। जैसे किसी थके हुए पथिक को पानी पीकर तृप्ति होती है, वही तृप्ति इस भाषा के उच्चारण, उन्नयन में होगी।
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इनसेट...
हिंदी हमारी आन है, सम्मान है हिंदी
तुलसी, कबीर, मीरा की पहचान है हिंदी
जो मन के अंधेरे से लड़ता सदा-सदा
भाषाओं के आकाश की दिनमान है हिंदी
जिसमें निराला, पंत हैं अज्ञेय, मुक्ति बोध
साहित्य के रत्नों की एक खान है हिंदी
गीतों में बुनी है कहीं छंदों में बुनी है
वह आमजन की सामवेद है हिंदी।
माहेश्वर तिवारी, नवगीतकार।
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सागर में मिलती धाराएं हिंदी सबकी संगम है।
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे, एक भरोसा अनुपम है।
गंगा कावेरी की धारा, साथ मिलाती हिंदी है।
पूरब-पश्चिम, कमल पंखुड़ी सेतु बनाती हिंदी है।
डॉ. बबीता गुप्ता, स्त्री रोग विशेषज्ञ।
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मानो मुझको मिल गए सारे तीरथ धाम
जब हिंदी में लिख दिया मैंने अपना नाम
पीछे सारे रह गए मजहब, फिरके, जात
जब लोगों ने प्यार से की हिंदी में बात।
राजीव प्रखर, युवा साहित्यकार।
ये बोले प्रबुद्धजन....
यह विडंबना है कि बोर्ड की परीक्षा में विद्यार्थी हिंदी में फेल हो रहे हैं। पास होने के लिए इसका ट्यूशन ले रहे हैं। हिंदी हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे ले जाने वाली संवाहिका है। मॉरीशस के विकास में हिंदी भाषा की बड़ी भूमिका है। वहां बड़ी संख्या में हिंदी भाषी लोग रहते हैं। अपनी भाषा के प्रति सम्मान और स्वाभिमान की चेतना हो तो भाषा और समाज आगे बढ़ते हैं। हमें हिंदी के प्रति हीनभावना को त्यागकर उसके स्वाभिमान के साथ जीना होगा।
माहेश्वर तिवारी, वरिष्ठ नवगीतकार।
हिंदी को सागर बनाना है तो स्थानीय बोलियों को नदियों के रूप में इसमें मिलाना होगा। इसे समृद्ध बनाने के लिए छोटी-छोटी बोलियों और शब्दों को स्वीकार करना पड़ेगा। आजादी के 74 वर्ष बाद भी हिंदी के सम्मान को बचाने और बढ़ाने की बात कर रहे हैं तो उस बिंदु पर जाना होगा जहां से यह प्रश्न उठा है। हिंदी के विद्यालय, विद्यार्थी और शिक्षक सर्वोपरि है। उन्हें दोयम दर्जे का नहीं समझना चाहिए। हिंदी को सहेजने वालों को सम्मान देंगे तो भाषा का विकास होगा और लोग इससे जुड़ने की कोशिश करेंगे।
डॉ. मीना कौल, प्राचार्य, एमएच कालेज।
हिंदी मां गंगा की तरह है और अन्य भाषाएं इसकी सहायक नदियां हैं। हिंदी देश की मूल भाषा है। जिस दिन यह सूख जाएगी उस दिन सभी भाषाएं सूख जाएंगी। अपनी भाषा को श्रेष्ठ करने के लिए किसी दूसरी भाषा की आलोचना करना सही नहीं है। रात को सोने के बाद अपनी मातृभाषा में स्वप्न दिखाई देते हैं। दिखावे के लिए किसी भी भाषा को बोल लें, लेकिन अपनी मातृभाषा खो नहीं सकती।
डॉ. अंबरीश गर्ग, साहित्यकार।
हिंदी देशवासियों को एकजुट रख सकती है। यह बहुत समृद्ध भाषा है। मातृभाषा होने की वजह से यह हमारे दिल के करीब है। समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है। अब इसे दुनिया में विशेष स्थान मिल रहा है। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी है कि भाषा के मान, सम्मान को आगे बढ़ाएं। भाषा का विकास होगा तो समाज और राष्ट्र का विकास आसानी से हो सकेगा।
डॉ. अंजना दास, प्राचार्य, गोकुलदास हिंदू गर्ल्स कालेज।
हमें भाषाओं की सीमा से बचना होगा। भाषा का जिक्र करने पर हिंदी पट्टी तक सिमट जाते हैं। हिंदी का अर्थ हिंद के निवासी है। इसके लिए भारत वर्ष की पुरानी परिकल्पना को स्वीकार करना पड़ेगा। हम भारत की संतान हैं और आज भाषाओं का अंतर देखते हैं, यह पिछले 150 वर्षों में हमारे बीच फैलाया गया भ्रम है। दक्षिण की भाषा में तमाम वह शब्द हैं, वह संस्कृत से निकले हैं और यह हिंदी में हैं। यूरोपीय भाषाएं भी संस्कृत से निकली हैं। मूलत: सभी भारतवासी एक हैं और यही हिंदी हैं हम सबका का मूल है।
डॉ. अजय अनुपम, वरिष्ठ साहित्यकार।
हिंदी का विकास, हिदंी का उत्थान होगा। इसे जन-जन की भाषा बनाने से कोई रोक नहीं सकता है। देश के सभी हिस्से में हिंदी सहज रूप से समझी और बोली जाने लगी है। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का होने वाला विस्तार इस बात का प्रमाण है कि हिंदी का विस्तार हो रहा है। यह हिंदी का बढ़ावा देखने का पैमाना है। इसमें अमर उजाला की भूमिका सराहनीय है।
राजीव प्रखर, युवा साहित्यकार।
विदेशी भाषा में वह उद्गार व्यक्त नहीं कर पाते हैं, जो करने चाहिए। इसके लिए हमारी मातृभाषा बहुत सक्षम है। कुछ वर्ष पहले तक दक्षिण के स्थानीय लोग हिंदी को बोल या समझ नहीं पाते थे, लेकिन अब वह समझने के साथ बोलने भी लगे हैं। विदेशों में भी कुछ लोगों ने हिंदी शब्दों को प्रचलन में लाना शुरू कर दिया है। हिंदी के प्रचार-प्रसार का असर है कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी प्रतिवर्ष उसमें भारतीय शब्दों को जोड़ती है।
डॉ. बबीता गुप्ता, स्त्री रोग विशेषज्ञ।
हिंदी हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है। हमारे दिल से निकलने वाली भाषा भी यही है। हिंदी बोलने वाले बच्चों को सम्मान महसूस करवाना होगा। जब वह हिंदी में बोलते हैं तो उनकी स्वाभाविक प्रतिभा निकलकर आती है। हिंदी वैज्ञानिक भाषा है। उच्चारण के लिए एक बार मात्रा ज्ञान किया तो भाव व्यक्त करने के लिए अलग-अलग शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती है। माहौल हिंदी का सम्मान बनाने वाला होना चाहिए।
डॉ. संगीता महेश, शिक्षिका।
हिंदी हमारी मातृभाषा है। वर्तमान में अंग्रेजी को बढ़ावा देते हैं। उसको बोलने में अपनी शान समझते हैं। यदि हिंदी भाषा के महत्व को हम नहीं समझेंगे और उसको प्रयोग में नहीं लाएंगे तो आने वाली पीढ़ी हिंदी भाषा को भूलना शुरू कर देगी। आज भी लोग हिंदी को प्रयोग में कम ला रहे हैं। छोटे बच्चों को हिंदी पढ़ने में भी समझ में नहीं आती है। अखबार में बहुत चीजें सीखने को मिलती हैं।
सविता गुरूंग, खिलाड़ी।
हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्थानीय भाषा का भी इसमें सहयोग लिया जाना चाहिए। इसके अलावा शिक्षक ऐसा बिंदू हैं, जो बच्चों को मातृभाषा से जोड़कर रख सकते हैं। शुरुआत में बच्चों के साथ उन्हें कठिनाई होगी, लेकिन बाद में यही बच्चे हिंदी की उन्नति के मोल को समझ पाएंगे। प्रारंभिक शिक्षा में अंग्रेजी सिखाओ, लेकिन हिंदी भाषा के महत्व को मत खोने दो।
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अभिषेक रुहेला, छात्र।
जब बच्चा बोलना सीखता है तो वह मां शब्द बोलता है। हिंदी भाषा पर हमें बहुत गर्व है। एक भारतीय होने के नाते इससे बड़ी बात क्या होगी कि विश्व संसद में जब स्वामी विवेकानंद ने हिंदी में भाषण शुरू किया था तो काफी देर तक तालियां गूंजती रहीं थीं। युवाओं को हिंदी के महत्व को समझना चाहिए। हिंदी शब्दकोष बढ़ाने के लिए अमर उजाला का संपादकीय पृष्ठ अवश्य पढ़ना चाहिए।
कुशल शर्मा, छात्र।
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