प्रदेश में शुगर लॉबी के बड़े ग्रुपों पर ‘बड़ी रकम’ फंस गई है। मौजूदा पेराई सत्र का तो बकाया है ही पिछले साल का भी यह ग्रुप 343 करोड़ रुपया नहीं दे पाए हैं। जबकि इन ग्रुपों के चेयरमैन लगातार शासन को शीघ्र भुगतान का भरोसा देते रहे हैं।
वहीं सरकार अपनी मिलों का भी 197 करोड़ रुपया किसानों को नहीं दिला पा रही है। प्रदेश में 116 चीनी मिलों द्वारा गन्ने की खरीद की जा रही है। मौजूदा पेराई सत्र की अगर बात की जाए तो चीनी मिलों पर 3430 करोड़ (230 के रेट पर) का बकाया है।
सबसे बड़ी रकम बड़े ग्रुपों ने ही दबा रखी है। जिन ग्रुपों की प्रदेश में दस या पांच चीनी मिलें चल रही हैं वह भी पेमेंट नहीं कर पा रहे हैं। जबकि शासन स्तर पर लगातार वार्ता का दौर जारी है। खास बात यह है कि अगर इन मिलों द्वारा ही पेमेंट कर दिया जाए तो बकाया पेमेंट का एक बड़ा बोझ कम हो सकता है।
पिछले पेराई सत्र का बकाया भी सबसे ज्यादा बड़े ग्रुपों पर ही है। मोदी ग्रुप पर 134 करोड़ रुपया शेष है। जबकि मवाना पर 163 करोड़। राणा पर 24 करोड़ है। बजाज पर 13 करोड़ की देनदारी है। जबकि यदु पर 9 करोड़ रुपया फंसा है।
सरकार कोआपरेटिव और निगम की मिलों का भी पेमेंट नहीं करा पा रही। कोआपरेटिव की 23 और निगम की एक चीनी मिल पर 197 करोड़ रुपया फंसा है। यह स्थिति तब है जब पेराई सत्र समाप्त होने जा रहा है।
अब बॉई प्रोडेक्ट की होगी निगरानी
अभी तक गन्ना विभाग के पास केवल चीनी बिक्री का ही रिकार्ड रहता है लेकिन अब शीरा और बगास के साथ ही डिस्टलरी की भी निगरानी रखने को कहा गया है। ताकि यह देखा जा सके कि मिलों ने कितना माल बेचा और उससे होने वाली आमदनी पर कितना पेमेंट किया।
सरकार को चला रहे बड़े ग्रुप : वीएम सिंह
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष वीएम सिंह का कहना है कि सरकार को ही यह बड़े ग्रुप चला रहे हैं। अब ऐसे में भला सरकार इनके खिलाफ क्या कार्रवाई कर सकती है। एक्शन का नाटक किया जाता है। मुकदमा दर्ज होता है मगर किसी की गिरफ्तारी नहीं होती है। किसी मिल पर दबिश तक नहीं जाती है।