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Moradabad News: यहां के बच्चों का पहाड़ा दो दुनी चार नहीं… महीने में चार हजार

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मुरादाबाद। रामगंगा के किनारे पर बसे वारसी नगर के अधिकांश घरों में दो दुनी चार का पहाड़ा नहीं गूंजता है। यहां की संकरी गलियों से घन-घन या खट-पट की आवाज आती है। पढ़ने-लिखने की उम्र में यहां के बच्चे महीने में तीन से चार हजार रुपये कमाने में लगे हैं। आर्थिक कमजोरी और जागरूकता के अभाव में अभिभावक बच्चों को पढ़ाने में रुचि नहीं दिखाते हैं बल्कि उन्हें मेहनत मजदूरी में लगा देते हैं।
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वारसी नगर घनी मुस्लिम आबादी वाला इलाका है। यहां की संकरी गलियों में तकरीबन तीस हजार की आबादी रहती है। कई गलियां इतनी तंग हैं कि एक साथ दो लोगों का निकलना मुश्किल है। यहां रहने वाले तीस फीसदी लोग किराये के मकान में रहते हैं। ज्यादातर मेहनत मजदूरी, ई-रिक्शा और ऑटो चलाने का काम करते हैं। यहां महीने में आठ से दस हजार कमाने वालों की संख्या कम ही है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक मोहल्ले में सरकारी स्कूल नहीं है। जो सरकारी स्कूल हैं वह दूर हैं। निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए सभी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। जो सक्षम हैं वही अपने बच्चाें को निजी स्कूलों में भेजते हैं। मोहल्ले में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है।
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एक तरफ आर्थिक कमजोरी तो दूसरी ओर जागरूकता की कमी है। यही वजह है कि यहां के बच्चे दो दुनी चार पढ़ने की उम्र में महीने में तीन से चार हजार कमाने का पहाड़ा पढ़ रहे हैं।
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- मोहल्ले में सरकारी स्कूल नहीं है। छोटे बच्चों को दूर भेजने में डर लगता है। निजी स्कूल में पढ़ाने के लिए हर कोई आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है। अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। - मेहताब जहां
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- मोहल्ले से स्कूल दूर है। यहां अधिकांश लोग मेहनत मजदूरी करते हैं। रोज के तीन से चार साै रुपये बड़ी मुश्किल से कमा पाते हैं। इतने में परिवार चलाना ही भारी पड़ता है। बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाना तो दूर सोचना भी हमारे लिए सपना जैसी बात है। - नदीम
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- 10 से 12 साल की उम्र ही बच्चे काम पर लग जाते हैं। कारखानों में काम करने लगते हैं। इसलिए यहां के लोग बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते हैं। मेरे परिवार को बच्चा भी फर्म में काम करता है। नजदीक में स्कूल न होने से भी दिक्कत होती है। - रीना
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- पति की माैत के बाद परिवार की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई थी। माली हालत इतनी खराब थी कि मेरा कोई बच्चे पढ़ नहीं सका। बच्चों ने पढ़ाई की जगह मेहनत मजदूरी की। अभी भी परिवार का गुजर बसर बड़ी मुश्किल से होता है। - अफसाना
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- सरकारी स्कूल दूर है। निजी स्कूल में पढ़ाने की स्थिति में नहीं हैं। न लड़कों को स्कूल भेज पाती हूं और न ही लड़कियों को। ऐसी स्थिति में बच्चों को मदरसे मेें भेजती हूं। जहां बच्चे थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं। - हिना
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- रोजाना बड़ी मुश्किल से तीन साै से चार साै रुपये कमा पाते हैं। इन पैसों से परिवार का पेट पालना मुश्किल होता है। निजी स्कूलों में फीस, काॅपी किताब इतनी महंगी होती हैं कि वहां बच्चों को पढ़ाने की सोच भी नहीं सकते हैं। - जाहिद
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बच्चों की पढ़ाई के लिए अभिभावकाें का जागरूक होना जरूरी
मुरादाबाद। क्षेत्र की पार्षद एरम नाज का कहना है कि मोहल्ले में मेहनत मजदूरी करने वालों की संख्या ज्यादा है। कई परिवार ऐसे हैं कि जिनके लिए दो जून की रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल होता है। बच्चों की पढ़ाई के लिए अभिभावकों का जागरूक होना जरूरी है। मोहल्लों के लोगों को जागरूक किया जाता है। कुछ बच्चाें का जीआईसी और दूसरे सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया गया है।
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वारसी नगर के आसपास यहां हैं स्कूल
- राजकीय इंटर काॅलेज
- राजकीय विद्यालय फैजगंज
- कस्तूरबा कन्या जूनियर हाईस्कूल
- प्राथमिक विद्यालय कानून गोयान
- प्राथमिक विद्यालय लाल बाग
- प्राथमिक विद्यालय मकबरा लाल स्कूल
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- शहर के जिन वार्डाें में सरकारी विद्यालय नहीं हैं। यदि वहां पर कोई व्यक्ति जमीन दान देता है तो विद्यालय बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। - वेगीश गोयल, खंड शिक्षाधिकारी नगर
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