तापीय विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश के प्रदूषण से बचाने के लिए एमआईटी में प्रोफेसर ए घोष के नेतृत्व में शोध शुरू किया गया है। शोध में सिविल अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर और छात्र भी शामिल हैं। तापीय विद्युत संयंत्रों में इस्तेमाल हो रहे कोयले में औसत फ्लाई ऐश की मात्रा लगभग 40 से 45 प्रतिशत होती है। भारतीय परिस्थिती में एक मेगावाट बिजली के उत्पादन में परिणाम स्वरूप लगभग 1800 टन फ्लाई ऐश प्रतिदिन उत्पादित होती है। इस राख में लगभग 20 प्रतिशत मोटी राख (बालू जैसी) और 80 प्रतिशत फ्लाई ऐश (उड़न राख) रहती है।
जिसे चिमनियों पर लगे इलेक्ट्रोस्टैटिक परेसिपिटेटटर्स के माध्यम से एकत्र किया जाता है। भारत में फ्लाई ऐश का उत्पादन वर्तमान में लगभग 120 मिलियन मीट्रिक टन है। जिसका 2020 तक 150 मिलियन मीट्रिक टन तक होना अुनमानित है। एमआईटी के निदेशक प्रोफेसर ए घोष इस प्रोजेक्ट के प्रमुख अन्वेषक हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के रेनूसागर और उड़ीसा में दो स्थानंो पर मिले प्रोजेक्ट पर फ्लाई ऐश के प्रदूषण नियंत्रण पर काम किया जा रहा है।
फ्लाई ऐश की बढ़ती मात्रा भूमि उपयोग, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरे के रूप में सामने आ रही है। अब तक 140000 हेक्टेयर भूमि फ्लाई ऐश के निस्तारण में बर्बाद हो चुकी है। इन डंपिंग साइट पर पानी का नियमित छिड़काव जहां इसे हवा में फैलने से रोक ने के लिए आवश्यक है वहीं दूसरी ओर इस पानी को भूगर्भ जल में जाने से रोकना भी एक बढ़ी चुनौती रहती है। क्योंकि फ्लाई ऐश में मौजूद घटक पानी को विषैला बना देते हैं। इसलिए इन डंपिंग साइट को उचित तरीके से डिजाइन किया गया है।
इसमें पानी की सुरक्षित निकासी की व्यवस्था और स्थिरता मानकों का विशेष ध्यान रखा जाता है। उड़ीसा और रेनूसागर में एमआईटी में चल रहे शोध की तकनीकी के जरिए ही फ्लाई ऐश का निस्तारण किया जा रहा है। जोकि फ्लाई ऐश के घातक प्रभावों को रोकने में सफल है।