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परिजनों पर बीत रहा एक-एक पल भारी, यूक्रेन से लौटने के लिए छात्रों की जद्दोजहद अभी भी जारी

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रूस के यूक्रेन पर किए गए हमले ने वहां पढ़ रहे छात्रों के परिजनों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। पिछले एक सप्ताह से वह हर पल अपने लाडलों की घर वापसी की राह देख रहे हैं। उन पर इंतजार का एक-एक पल भारी पड़ रहा है। उधर, यूक्रेन में छात्रों को पहले बॉर्डर पार करने और अब भारत की फ्लाइट के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। जिला प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार अब तक मुरादाबाद में 50 विद्यार्थी वापस लौट चुके हैं, जबकि 12 छात्र व व्यक्ति अभी भी लौटने के इंतजार में हैं।
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बैंक कालोनी खुशहालपुर निवासी रामस्वरूप ने बताया कि उनका बेटा राजकुमार यूक्रेन के सूमी शहर में नौकरी करता है। वहां पर राजकुमार की पत्नी, एक साल की बेटी और उसकी सास हैं। सूमी के नाजुक हालातों और मासूम बेटी की सुरक्षा की वजह से परिवार शहर को छोड़कर वहां के एक गांव में चला गया है। रामस्वरूप के मुताबिक बेटे और उसके परिवार की सुरक्षा की चिंता हर पल सताती है। जब फोन करते हैं तो कई बार इंटरनेट की समस्या होने की वजह से बात नहीं हो पाती है। ऐसे में जब बेटे का फोन आता है तो वहां के हालात की जानकारी मिल पाती है। उन्होंने बताया कि रोमानिया बॉर्डर पर जाने के लिए न उन्हें बस मिल रही है और न ही ट्रेन। उन्हें अभी तक वहां से निकलने का मौका ही नहीं मिल पाया है। अधिकारियों से बातचीत चल रही है। वह कब तक निकलेंगे, इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते।
फ्लाइट दिलवाने के लिए केंद्रीय मंत्री से लगाई गुहार
लाजपत नगर निवासी कौशल भारद्वाज दिनीप्रो में एमबीबीएस चौथे साल का छात्र है। उनके पिता डॉ. नरेश शर्मा ने बताया कि कौशल दो मार्च को रोमानिया पहुंच गए थे, लेकिन भारत आने के लिए अभी तक फ्लाइट नहीं मिल पा रही है। भारतीय दूतावास में अधिकारियों से बात करने का प्रयास कर रहे हैं तो कोई फोन नहीं उठा रहा है। शनिवार शाम को साढ़े पांच बजे एक केंद्रीय मंत्री के साथ ऑनलाइन मीटिंग में बेटे को फ्लाइट दिलाने का अनुरोध किया और फ्लाइट नहीं मिलने का कारण पूछा तो उन्होंने कोई कारण नहीं बताया। सिर्फ आश्वासन दिया है। तीन दिन से फ्लाइट नहीं मिलने की वजह से उसकी बहुत चिंता सता रही है। रोमानिया में शेल्टर होम में रहने और खाने की व्यवस्था है, लेकिन कौशल के पास कपड़े नहीं होने की वजह वह कई दिनों से उन्हीं कपड़ों को पहने हुए है। बस यह सुकून है कि कौशल वार जोन से बाहर निकल आया है।
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36 घंटे के इंतजार के बाद हंगरी पहुंचे दो भाई
लालबाग निवासी पूर्व सांसद हाजी मोहम्मद सिद्दीकी के पोते मोहम्मद अरीब और मोहम्मद फाइक दोनों विन्नीत्सिया में एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र हैं। उनके पिता डॉ. मोहम्मद सादिक ने बताया कि अरीब और फाइक बुडापेस्ट में हैं। शनिवार को 36 घंटे के इंतजार के बाद दोनों बेटे हंगरी पहुंचे हैं। विन्नीत्सिया में अरीब और फाइक फ्लैट में रहते हैं। एयरबेस पर हमले के बाद उन्होंने राशन खरीद लिया था, जिसकी वजह से उन्हें खाने पीने की कोई दिक्कत हुई। डॉ. मोहम्मद सादिक के अनुसार विश्वविद्यालय प्रशासन वर्ष के हिसाब से छात्रों को विन्नीत्सिया छोड़ने की अनुमति दे रहा था, इसलिए दोनों वहां से तीन मार्च को निकल पाए। बस चालक ने उन्हें बीच रासते में ही छोड़कर चला गया। दोनों बेटों के साथ 11 छात्रों का ग्रुप था। इसके बाद जिसको जो साधन मिला, उसी से बॉर्डर तक पहुंचे। वहां से वह रात में पुलिसकर्मियों के साथ उनकी वैन से जोहान रेलवे स्टेशन हंगरी पर पहुंचे और वहां से ट्रेन द्वारा बुडापेस्ट पहुंचे हैं। इस दौरान छात्रों से किसी ने किराया नहीं लिया। सभी ने सहयोग किया है। वहां के लोगों ने खाना खिलाया और होटल दिया है। भारतीय दूतावास से अब संपर्क हुआ है। कब तक दोनों बेटे मुरादाबाद लौट पाएंगे, इसके बारे में कुछ कह नहीं सकते।
ब्रेड और बिस्किट खाकर कीव में बिताए छह दिन
मुगलपुरा लाकड़ी वालान निवासी मोहम्मद हसनैन कीव में एमबीबीएस चौथे वर्ष के छात्र हैं। उनके बड़े भाई काशिफ रजा ने बताया कि हसनैन बुडापेस्ट पहुंच गए हैं। उन्होंने दो मार्च को एक घंटे में बॉर्डर पार कर लिया था। अभी तक फ्लाइट की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। उन्होंने बताया कि जब हसनैन कीव में थे तो दिन में थोड़ी देर के लिए बंकर से बाहर आते थे और फिर वापस बंकर में चले जाते थे। आसमान में फाइटर प्लेन उड़ते थे और धमाकों की आवाजें गूंजती थीं। जब वहां बाजार खुला तो उन्हें ब्रेड और बिस्किट व अन्य सामान खरीद लिया था। छह दिन उन्होंने यही सब खाकर बिताए हैं। हसनैन दूतावास से बार-बार अनुरोध कर रहे थे, लेकिन कोई संपर्क में नहीं था। जब वह स्टेशन गए तो यूक्रेन के लोगों ने उन्हें ट्रेन में बैठने ही नहीं दिया था। इसके बाद वह एक शहर में पहुंचे और रात वहीं बिताई, क्योंकि रात में निकलना खतरनाक था। इसके बाद एक बस से वह हंगरी बॉर्डर पर पहुंचे। काशिफ रजा के अनुसार वह बड़ी बेसब्री से अपने भाई के लौटने का इंतजार कर रहे हैं।
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