जुबान चाहे गुजराती हो या बंगाली या फिर साउथ की। हाफिज की जुबान चाहे जो भी लेकिन हर जुबान से कुरान का तलफ्फुज (उच्चारण) एक जैसा होता है। इससे कुरान सुनने वालों को अजनबियत का एहसास नहीं होता है। जबकि हर हाफिज की मादरी जुबान अलग-अगल होती है। बावजूद इसके तलफ्फुज में कोई फर्क नहीं आता है।
वैसे तो अल्लाह का पूरा कलाम खासियतों से भरा है।
एक-एक अल्फाज की अपनी कुछ ना कुछ खासियत है। जिसे बयान कर पाना मुश्किल है। इसकी एक खासियत ये भी है कि कुरान सुनाने वाले हाफिजों से अजनबियत का एहसास नहीं होता है। किसी मुल्क या प्रदेश का हाफिज कुरान सुनाए, लेकिन तलफ्फुज एक जैसा होता है। अगर वही हाफिज अपनी मादरी जुबान में बात करे तो अजनबियत का एहसास कराता है। क्योंकि उसकी जुबान से उसके मुल्क, प्रदेश या इलाके का पता चल जाता है।
मदरसा अरबिया इमदादिया के मोहतमिम मौलाना मोहम्मद असजद कासमी के मुताबिक कुरान के अल्फाज और पढ़ने का लहजा ऐसा होता है कि उसका तलफ्फुज में कोई फर्क नहीं होता है। दुनिया का हर मुसलमान लहजे से पढ़ता है। ये कुरान की एक खासियत है।