ये अजीब इत्तफाक है कि सरकारी रिकार्डों में जिले के सभी बूचड़खाने बंद हैं। प्रशासन की माने तो यहां एक भी पशु नहीं काटा जाता है। लेकिन असालतपुरा के नाले में बहाता खून और इस इलाके से उठीं बदबू कुछ और ही बताती है।
ये हाल केवल असालतपुरा का नहीं, बल्कि शहर से लेकर देहात तक तमाम जगह ऐसी हैं। जहां बूचड़खाने चल रहे हैं। पिछले पांच साल तक इन बूचड़खाने तक पुलिस ने पहुंचने की हिम्मत तक नहीं जुटाई। अब अफसर प्लान बना रहे हैं कि अवैध कटान गृह पर सख्त कार्रवाई करेंगे।
गोपनीय तरीके से पुलिस टीमें लगाकर पता कराया जा रहा है कि जिले में कहां कहां बूचनखाना है। गलशहीद का असालतपुरा, मैनाठेर में सिरसी, भोजपुर में पीपलसाना, गुलाबबाड़ी में बड़े पैमाने पर पशु कटान खुलेआम किए जाते थे। लेकिन बसपा सरकार में इन बूचड़खाने पर सख्त कार्रवाई की गई थी।
बूचड़खाने बंद कर दिए गए थे और इनका संचालनकर रहे लोगों पर केस दर्ज किए गए थे। इसके बाद सभी अवैध कटान बंद कर दिया गया था। सत्ता बदली तो मीट माफिया फिर से सक्रिय हो गए थे और उन्होंने अवैध धंधे शुरू कर दिए थे। कागजों में भले ही ये कटान गृह बंद रहे।
लेकिन इनका धंधा कभी बंद नहीं हुआ। पिछले पांच साल से पुलिस अफसर सब कुछ जानते हुए भी खामोश रहे। मीट माफिया और इस कारोबार में लिप्त लोगों की सियासी पकड़ इतनी मजबूत थी कि किसी अफसर ने कार्रवाई करनी भी चाही तो उसका ट्रांसफर करा दिया गया।
कांठ थानाक्षेत्र में खुले जा रही मीट फैक्ट्री की परमिशन न देने पर तत्कालीन एसएसपी डीसी दुबे का तबादला करा दिया गया था। जिले में अब भी सैकड़ों अवैध बूचड़खाने चल रहे हैं। फिर से सत्ता बदल गई है।
भाजपा ने चुनाव से पहले ही बता दिया था कि अगर प्रदेश में उनकी सरकारी आई तो सभी बूचड़खाने बंद कर दिए जाएंगे। अब अफसरों के भी अंदाज बदल गए हैं। पांच साल तक जिन्हें पशु कटान गृह दिखाई नहीं दिए। अब उन्होंने अधीनस्थों को आदेश दिए हैं कि अपने अपने क्षेत्रों में चल रहे अवैध पशु कटान गृह पर कार्रवाई करें।