वक्त सुबह पांच से छह बजे बजे के बीच का रहा होगा। लंबे रूट की इस कामाख्या एक्सप्रेस में सफर कर रहे पैसेंजरों में ‘हैप्पी मदर्स डे’ गूंजने लगा था। जिन बच्चों की मम्मियां उनके साथ थीं वह उन्हें विश कर रहे थे जबकि तमाम ऐसे थे जो मोबाइल पर अपनी मां से बातचीत में व्यस्त थे।
लेकिन इसी कोच में एक मां अपने मासूम बेटे की लाश को कलेजे से लगाए बिलख रही थी। कभी उसका माथा चूमती तो कभी आसपास बैठे यात्रियों को बेटे का चेहरा दिखाकर कहती...देखो मेरा राजकुमार चला गया।
हरदोई से मुरादाबाद तक अपने बेटे की लाश के साथ सफर करने वाली इस मां का नाम मीरा है। मीरा अपने पति सुनील कुमार के साथ भगत की कोठी जा रही थी। पांच माह का मासूम चंदन मीरा की गोद में था। दोनों मियां बीवी कामाख्या एक्सप्रेस में बिहार के आरा स्टेशन से सवार हुए थे।
मीरा और सुनील अपने मासूम बेटे से खेलते हुए सफर कर रहे थे। कभी सुनील उसे गोद में ले लेता तो कभी मीरा। जब ट्रेन लखनऊ पहुंची तो चंदन की तबीयत बिगड़ने लगी। वह रोने लगा।
मीरा को लगा कि शायद गर्मी के कारण बेचैनी हो रही होगी तो वह बेटे को लेकर खिड़की के पास बैठ गई। मगर बच्चा शांत नहीं हुआ। हरदोई के पास चंदन खामोश हो गया। पांच महीने के इस मासूम ने मां की गोद में दम तोड़ दिया।