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मां की कॉल आती है, बड़ा रुलाती है.. तुम कब आओगे

Mon, 07 Nov 2016 02:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
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मुरादाबाद में छठ पूजा पर अस्ताचल गामी सूर्य को अर्घ्य देतीं महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला
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कुछ नौकरी की मजबूरियां हैं तो कुछ बच्चों की पढ़ाई छूटने की चिंता..। मजबूरी और जिम्मेदारियों की बेड़ियों में पैर ऐसे फंसे हैं कि चाहकर भी बिहार के तमाम परिवार अब छठ मनाने अपने गांव नहीं जा पाते।
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ऐसे में त्यौहार मनाने को यहां कालोनियों में ही आर्टिफिशियल तलाब बना लेते हैं। पर गांव की याद पल - पल आती है। जैसी ही छठ आती है तो बचपन में गांव में मनाए छठ पर्व की यादें ताजा हो जाती हैं। मन में हूक भी उठती है पर पैरों में पड़े मजबूरियाें के बंधन जाने की इजाजत नहीं देते।

ऐसे में त्योहार पर जब गांव में बैठे मां - पिता की कॉल आती है तो आंखें दोनों ओर नम हो जाती हैं।.. घर - परिवार की बातों के बाद जब उधर से मां रुंधे गले से पूछती है.. बेटा घर कब आओेगे ..? तो आंखों आंसुओं को चाहकर भी नहीं रोक पातीं। यहां रह रहे बिहार के कई परिवार ऐसे हैं जो मजबूरियों चलते पिछले कई - कई सालों से छट पर घर नहीं जा पाए हैं।
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छठ पूजा का पूरब के लोगाें के लोगों के लिए खास महत्त्व है। बिहार के लोग देश-विदेश के किसी भी कोने में हों, छठ पूजा पर अपने घर जरूर आते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो नौकरी व अन्य कारणों से अपने घर नहीं जा पाते। बावजूद इसके वे जहां कहीं भी होते हैं छठ पूजा जरूर मनाते हैं।

 महानगर के रामगंगा नदी में चट्टा पुल के नीचे छठ पूजा मनाने पहुंचे सैकड़ों लोगों में से कुछ लोग ऐसे भी पहुंचे थे जो छठ पर  पिछले दस सालों से अपने घर नहीं गए हैं। उन लोगों ने बताया कि उन्हें गांव में होने वाले छठ पूजा की बहुत याद आती है।   लेकिन नौकरी और अन्य विवशता के कारण वे छठ पर अपने घर नहीं जा पाते। गांव में छठ पूजा की बात ही अलग होती है। लोेग नहाए-खाए के दिन से ही घाट बनाने की तैयारी में जुट जाते हैं। गांव की नदी या तालाब किनारे सभी लोग मिलकर घाट बनाते हैं। 
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