अमर उजाला ब्यूरोमुरादाबाद। शहर की कई सशक्त महिलाओं ने दिखा दिया है कि उम्र महज एक नंबर है। 70 से अधिक आयु में भी उनकी ऊर्जा युवाओं जैसी है। उम्र के इस पड़ाव पर उनका संकल्प प्रेरणा देने वाला है। संगीत, आत्मरक्षा व अन्य माध्यमों से वह न केवल बेटियों में आत्मविश्वास का संचार कर रही हैं, बल्कि उन्हें हुनरमंद बनाकर आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। महिलाओं के कॅरिअर को संवारने के बाद यह महिलाएं अन्य बालिकाओं के लिए भी उम्मीद का केंद्र हैं।
संगीत के क्षेत्र में छाईं बेटियां
गौर ग्रेसियस निवासी 79 वर्षीय बालसुंदरी तिवारी ने कहा कि पिछले दिनों दो कार्यक्रम करवाए थे, जिसमें लखनऊ और दिल्ली के बच्चाें ने प्रतिभाग किया था। वर्तमान में करीब आठ बालिकाओं को शास्त्रीय संगीत भी सिखा रही हैं। उन्होंने कहा कि आजकल रैप और रीमिक्स का दौर चल रहा है। कई बच्चे सिर्फ फिल्मी गीतों की दुनिया को ही पूरा संगीत समझ लेते हैं। जब वह मेरे पास आते हैं तो मैं उन्हें समझाती हूं कि राग संगीत की आत्मा और आधार हैं। फिल्मी गीत या लोकगीत हों, उसका आधार राग होते हैं और राग सिखाती हूं। छात्रा सिद्धी भटनागर ने आठ साल सीखने के बाद संगीत में वनस्थली से पीएचडी किया। कनाड़ा में रह रहीं किरन ने विज्ञान संकाय छोड़कर संगीत लिया और उन्होंने संगीत का मनोविज्ञान नाम से किताब भी लिखी है। संगीत के क्षेत्र में कई बालिकाओं ने नाम रोशन किया है।
सिलाई सिखाकर बेटियों को बना रहीं आत्मनिर्भर
देवविहार निवासी और आर्य कन्या इंटर कॉलेज से वर्ष 2000 में सेवानिवृत्त होने के बाद रीता सिंह ने ऑल इंडिया वूमेन कांफ्रेंस मुरादाबाद संस्था बनाई। रीता सिंह के अनुसार मुझे लगता है कि मैं नौकरी से सेवानिवृत्त हुई हूं, बेटियों के प्रति दायित्वों से नहीं। वर्तमान में संस्था की ओर से चार सिलाई और ब्यूटीशियन के सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। यहां पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से 40 लड़कियां नि:शुल्क सीख रही हैं । तीन और छह महीने का कोर्स करवाने के बाद आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। स्कूलों में आत्मरक्षा, संस्कार, स्वच्छता, पर्यावरण जागरूकता का हर महीने एक कार्यक्रम जरूर करवाती हूं। शोषण के खिलाफ जागरूक करती हूं।
बेटियों का स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता
एक निजी विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर और दयानंद कॉलेज में वर्ष 2015 में सेवानिवृत्त होने के बाद आशियाना निवासी
73 वर्षीय डॉ. राजकुमारी सिंह ने कहा कि मैंने अपनी उम्र एनसीसी से जुड़कर गुजारी है। उससे मुझे प्रोत्साहन मिला है कि जब तक काम कर सकते हैं तो करिए। शारीरिक स्वस्थ रहेंगे तो मानसिक रूप से स्वस्थ रहेंगे। उम्र मायने नहीं रखती हैं। मेरे यहां पर 55 छात्राएं एनसीसी कैडेट हैं। उनको भी स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करती हूं। सभी गतिविधियों में प्रतिभाग करवाती हूं, ताकि वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकें। इसी से कॅरिअर भी बेहतर होगा। इस साल गणतंत्र दिवस पर एक छात्रा ने पीएम रैली में प्रतिभाग किया है। मेरे ऑफिस का नियम है कि उसका दरवाजा हमेशा खुला रहता है। कोई छात्रा अपनी परेशानी बताने के लिए आए तो कोई भी चपरासी उसे रोकेगा नहीं। प्रतिदिन दो से तीन छात्राएं आकर अपनी परेशानी साझा करती हैं।