मुरादाबाद। रेलवे के यात्रियों को स्टेशनों पर मिलने वाला पानी पीने योग्य नहीं है। यात्री उस पानी को पीने के लिए मजबूर हैं जो मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है। सैंपल फेल होने से ये तथ्य आन रिकार्ड हो चुके हैं। उत्तर रेलवे महाप्रबंधक उत्तर रेलवे ने पेयजल का स्तर सुधारने के लिए गाइड लाइन तक जारी की है। इसके बाद भी मात्र क्लोरीनेशन बढ़ाकर सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों से इतिश्री कर ली। जबकि मंडल में पेयजल की रिपोर्ट खुद डीआरएम देख रहे हैं। हालांकि सैंपल भरने की प्रक्रिया में सुधार के बाद से फेल हो रहे सैंपलों की संख्या घटी है।
मंडलभर के स्टेशनों से भरे गए पानी के सैंपलों के लगातार फेल होने पर महाप्रबंधक उत्तर रेलवे वीके गुप्ता ने इसे गंभीरता से लिया था। कई स्थानों पर पानी के सैंपल शत प्रतिशत फेल हो चुके थे। रिपोर्ट के अनुसार मंडलभर में कई स्टेशनों का पानी पीने योग्य नहीं था। मुरादाबाद स्टेशन के भी आधे से अधिक नमूनों की रिपोर्ट नकारात्मक आई थी। जिसके चलते उन्होंने आदेश दिए थे कि स्टेशनों पर आपूर्ति किए जाने वाले पानी का सैंपल नियमित तौर पर भरवाएं। सैंपल फेल होने वाले पानी को वाशिंग लाइन और कोच में प्रयोग किया जाए। पेयजल के लिए नए बोरिंग कराए जाएं। साथ ही सैंपल भरवाने का सही तरीका बताने के लिए कार्यशाला का भी आयोजन किया गया। इसके बाद भी पानी के सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। एडीआरएम हितेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि रेलवे इस मामले को गंभीरता से ले रहा है। जल्द इसमें सुधार किया जाएगा। मंडल से भरे गए तीस प्रतिशत सैंपल फेल हुए हैं। जिसे चिंता बनी हुई है। इसमें सुधार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अभी तक रिपोर्ट सीधे मुख्यालय भेजी जाती थी, लेकिन अब खुद डीआरएम उनका आकलन कर रहे हैं। जिसका अध्ययन करने के बाद सुधार की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। अभी प्राथमिक तौर पर क्लोरीनेशन कराया जा रहा है।
क्लोरीन और बैक्टीरिया की होती है जांच
मुरादाबाद। रेलवे स्टेशनों से पानी के जो सैंपल भरे जाते हैं उनमें क्लोरीन की मात्रा और बैक्टीरिया का स्तर ही मापा जाता है। जबकि पानी की गुणवत्ता को लेकर कराए शोधों के अनुसार इनमें जहरीले तत्वों की मात्रा बढ़ने लगी है। फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट को सीधे जमीन में डालने से खतरनाक रासायनिक पदार्थ भी पानी में मिल रहे हैं। जिसकी जांच अभी तक नहीं कराई गई। नियमानुसार इसकी भी जांच होनी चाहिए। खास बात मंडल के सैंपल इन्हीं दो मानकों पर फेल हो रहे हैं। जबकि हैवी मैटल आदि की जांच पर तो पानी की गुणवत्ता भगवान भरोसे ही है।