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चलो रे कांवरिया शिव के धाम

Wed, 06 Mar 2013 05:31 AM IST
Moradabad
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मुरादाबाद। कांवर यात्रा के लिए भक्तों में समय के साथ उत्साह और कांवरिया बनने की लालसा बढ़ रही है। पिछले वर्षों की तुलना में कांवरियों की संख्या में काफी वृद्घि हुई है। कांवरियों के लिए नियम भी कुछ खास हैं जिनका पालन शुभ अशुभ के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है। इन्हीं नियमों में कांवर का मंदिर में दान। पहली कांवर जलाभिषेक के बाद पुजारी को दक्षिणा के साथ मंदिर में दान की जाती है।
जलाभिषेक के उपरांत कांवर को घर पर रखना शुभ माना जाता है। कांवरिया शिवलिंग में जलाभिषेक के बाद बनी हुई कांवर सुरक्षित अपने घर ले जाकर रखते हैं। यह कांवर बरसों तक रखी रहती है। बांस की कांवर टूटने पर गंगा अथवा रामगंगा नदी में विसर्जित किया जाता है। कुछ लोग टूटी हुई कांवर को मंदिर में किसी वृक्ष अथवा पीपल के नीचे रख देते हैं जहां पर पूजा होती है। करीब 25 बरस से कांवर यात्री बनने वाले जग्गा सिंह के अनुसार पहली बार कांवर उठाने वाले के लिए जरूरी है कि वह कांवर का मंदिर में दान करे। कुछ लोग मंदिर की जगह कांवर को घर पर रखना चाहते हैं ऐसे में वह पुजारी को आटा, दाल, चावल फल आदि सहित नगद दक्षिणा देकर पुजारी की अनुमति लेकर कांवर घर ले जाते हैं।
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रोड के भोग से संपन्न होती कांवर यात्रा
मुरादाबाद। शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद कांवरिया मंदिर परिसर में ही रोड (आटे की मोटी गोल रोटी) तैयार करते हैं। कांवर यात्री के घर से परिजन आटा, गुड़, गरी, चिरौंजी आदि मेवा लेकर मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में चूल्हा जलाकर कांवरिया यह रोड तैयार करता है। एक रोड करीब 200 से 250 ग्राम की होती है। इस रोड का भोग शिवलिंग को लगाया जाता है। इस भोग के बाद ही कांवर यात्रा पूरी तरह संपन्न मानी जाती है।
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51 शीशियों तक की कांवर
मुरादाबाद। कांवर के साथ खजाना (जलदानी) भी कांवरिया के कंधे पर होता है। इस खजाना में भक्त 11, 21 और 51 शीशियां तक रखते हैं। यह प्लास्टिक की छोटी-छोटी शीशियां होती हैं। इनमें एक बड़ी जबकि अन्य छोटी होती हैं। गंगा स्नान के बाद भक्त सभी शीशियों में गंगाजल भरते हैं। गंगा जल लेकर चलने वाले कांवरिया छोटी शीशियों में मौजूद गंगाजल से रास्ते भर पड़ने वाले शिवालयों में अभिषेक करते हुए आगे बढ़ते हैं।
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