मुरादाबाद जिले में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर चिंताजनक है। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक जिले में 44 गर्भवती और प्रसूता महिलाओं की मौत दर्ज हुई है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है जिसमें महिलाएं अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ रही हैं।
दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में एक भी मातृ मृत्यु दर्ज नहीं है। मातृ मृत्यु सर्विलांस समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार 44 मौतों में से 21 महिलाओं की मौत निजी अस्पतालों में हुई, जबकि 11 महिलाओं ने घर पर और 12 ने रास्ते में या रेफर के दौरान दम तोड़ा।
स्वास्थ्य विभाग वर्षों से संस्थागत प्रसव बढ़ाने और सुरक्षित मातृत्व के दावे करता आ रहा है, लेकिन 11 महिलाओं की घर पर मौत यह बता रही है कि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में प्रसव पूर्व निगरानी अब भी कमजोर है। आशा और एएनएम स्तर पर हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान और लगातार निगरानी का दावा भी इन आंकड़ों के सामने फीका पड़ता दिख रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार ताजपुर क्षेत्र में सबसे ज्यादा 10 मातृ मौतें दर्ज हुईं। विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, संक्रमण और समय पर ऑपरेशन न मिलना मातृ मृत्यु की बड़ी वजहें होती हैं। जिले में रास्ते में हुई 12 मौतें बताती हैं कि रेफरल सिस्टम और इमरजेंसी ट्रांसपोर्ट अभी भी बेहद कमजोर है।
कई बार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल और वहां से मेडिकल कॉलेज रेफर करने में ही कीमती समय निकल जाता है। हालांकि विभाग ने सीएमओ के द्वारा सभी 44 मामलों की समीक्षा पूरी होने का दावा किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक गांव स्तर पर निगरानी, एंबुलेंस की उपलब्धता, ब्लड बैंक और प्रसूति विशेषज्ञों की व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तब तक सुरक्षित मातृत्व का दावा कागजों में ही सीमित रहेगा। सीएमओ डॉ. कुलदीप सिंह का कहना है कि स्थिति में पहले से काफी सुधार हुआ है। अनुमानित मौतों के सापेक्ष आंकड़ा देखेंगे तो सुधार नजर आएगा।