फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सालों बाद में एक अदद नौकरी की तलाश

विज्ञापन
विज्ञापन
मुरादाबाद। पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं का सपना एक नौकरी प्राप्त करने का होता है, ताकि वह अपने परिवार की जिम्मेदारियों को बांट सकें। रोजगार की आस में भरे जाने वाले फार्म सालों बाद भी उम्मीद तक ही सीमित रहते हैं। कई-कई साल तक संघर्ष करने के बाद भी युवाओं को रोजगार प्राप्त नहीं हो पा रहा है। सरकारी भर्तियां लचर कार्यप्रणाली के चलते कोर्ट में पहुंच रही हैं तो निजी क्षेत्रों में भी प्रतिस्पर्धा तगड़ी है। युवाओं का कहना है कि कई वर्षों की मेहनत और लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी बेरोजगार हैं।
विज्ञापन



वर्ष 2016 से शारीरिक शिक्षकों की भर्ती का सरकार से केस चल रहा है। 32 हजार पद खाली पड़े थे। भर्ती नियुक्ति की कगार पर थी, लेकिन नई सरकार आई और उसने हमारे खिलाफ केस कर दिया। कहा कि प्रक्रिया दोबारा से होगी। इसमें मेरिट के अनुसार नौकरी लगती है, वह लिखित परीक्षा कराना चाहते हैं। बार-बार केस की सुनवाई में जाना पड़ता है। सब लोग आपस में पैसा इकट्ठा कर लगा रहे हैं। दो बार हाईकोर्ट से जीत गए हैं। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। वकील करने, आने-जाने में अभ्यर्थियों का करोड़ों रुपयों का खर्च हो गया है। नौकरी की अभी उम्मीद नहीं है कि कब मिलेगी।
अनूप सिंह, अवंतिका कालोनी।


टीजीटी, रेलवे, एफसीआई और क्लर्क के कई सारे फार्म डाले और परीक्षा दे चुका हूं। शिक्षिकों की 68 हजार रिक्तियों की परीक्षा दी। दो साल हो गए, अभी तक परिणाम जारी नहीं हुआ है। रेलवे की दोबारा से तैयारी कर रहा हूं। 2015 में एमएससी करने के बाद पीजीटी में फार्म 2016 में डाला था। उसकी परीक्षा मार्च में हुई है। अभी तक परिणाम नहीं आया है। एक फार्म भरने में पांच सौ रुपये का खर्चा आता है। परीक्षा देने के लिए किराया अलग से होता है, लेकिन नौकरी नहीं मिली।
विज्ञापन

वेदपाल सिंह, एमडीए।

मैंने नौकरी के लिए 2014 से शुरुआत की है। नवंबर में रेलवे की परीक्षा दी थी। अब परिणाम का इंतजार है। बीए करने के बाद आईटीआई इलेक्ट्रिकल से की है। निजी क्षेत्र में करना चाहते हैं, लेकिन वहां वेतन पांच से छह हजार रुपये ही दे रहे हैं। उसमें भी नौकरी मिल नहीं पा रही है। रोजगार के लिए भटक रहे हैं। मम्मी-पापा की जिम्मेदारी भी है।
विज्ञापन

संजय कुमार, गांव बड़पुरा, भगतपुर टांडा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें