इबादत में डूबी रोजेदारों से गुलजार जामा मस्जिद
- मुकद्दस रमजान के चांद के साथ बदल गई फिजा
- धीमी-धीमी गूंजती हैं कुरआन-ए-पाक की आयतें
- फज्र से नमाज-ए-तरावीह तक होती है इबादत
अमर उजाला ब्यूरो
मुरादाबाद
फज्र का वक्त हो या जोहर का, या फिर अस्र और ईशा का वक्त। अजान के साथ रोजेदारों की चहल कदमी बढ़ जाती है। हर किसी का रुख ऐतिहासिक इबादतगाह की ओर होता है। जहां तपिश भरी गर्मी में मोटी दीवारों से टकराती हवाओं के बीच धीमी-धीमी गूंजती कुरआन-ए-पाक की आयतें। खुदा की इबादत में सजदे में झुकते सिर। ये नजारा मुकद्दस रमजान के पाक महीने में जामा मस्जिद का है, जो इन दिनों इबादत में डूबी है। रोजेदारों की इबादत से गुलजार है।
माह-ए-रमजान का चांद दिखने के साथ ही अपने में इतिहास समेटे शहर की जामा मस्जिद में फिजा बदल गई है। आजकल रोजेदारों का दिन का अधिक हिस्सा यहीं गुजरता है। मस्जिद में छोटे-बड़े रोजेदार खुदा की बंदगी में जुटे हैं। कोई कुरआन-ए-पाक की तिलावत करता है तो किसी के हाथों में इबादत की तस्वीह होती है। जोहर की नमाज अदा करने के लिए मस्जिद में दाखिल हुए कई रोजेदार अस्र की नमाज के बाद ही घर की ओर रुख करते हैं। इस दौरान वह अल्लाह तआला की इबादत में मशगूल रहते हैं। शहर इमाम सैयद मासूम अली आजाद ने बताया कि जामा मस्जिद पौने चार सौ साल से अधिक पुराना है। इसका तामीर वर्ष 1637 में मुगलकालीन शहंशाह शाहजहां के गवर्नर रुस्तम खां ने कराया था। तब रामगंगा नदी मस्जिद के करीब सेे होकर बहती थी।
डेढ़ लाख लोग पढ़ते हैं अलविदा की नमाज
मुरादाबाद। रमजान के आखिरी जुमे पर जामा मस्जिद में नमाजियों की हुजूम उमड़ पड़ती है। शहर के तमाम मस्जिद होने के बावजूद यहां तकरीबन डेढ़ लाख लोग अलविदा की नमाज अदा करते हैं। मस्जिद के सामने का पार्क नामाजियों से भर जाता है। यही नहीं रामगंगा पुल पर भी नमाज अदा की जाती है।
चार रास्तों से दाखिल होेते हैं नमाजी
मुरादाबाद। जामा मस्जिद में नमाजियों के दाखिल होने के लिए चार दरवाजे बने है। पहला मेन गेट है, जो जामा मस्जिद के मेन चौराहे से अंदर आता है। दूसरा गेट चूने के भट्ठे वाला है। तीसरा गेट सामने का है, जो रामगंगा की ओर से अंदर आता है। जबकि चौथा गेट हम सफर हाल की ओर है। चार गेट होने से नमाजियों को मस्जिद से निकले में सहूलियत मिलती है।
मस्जिद के अहाते में है दस कब्र
मुरादाबाद। मस्जिद परिसर में एक अहाता बना है, जिसमें दस कब्र हैं। बताया जाता है कि ये कब्र जामा मस्जिद के इमाम और कारी के हैं, जिन्होंने यहां खिदमत की है। नमाज के दौरान जामा मस्जिद में तकरीबन 48 सफें लगती है। हर सफ में करीब 150 से अधिक नमाजी शामिल होते हैं। बताया जाता है कि यहां एक साथ दस हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं।
वजू के लिए बना है पांच फीट गहरा हौज
मुरादाबाद। जामा मस्जिद में आने वाले नामाजियों के तादाद को देखते हुए वजू के लिए हौज बनाया गया है। करीब पांच फीट गहरा हैज हमेशा पानी से भरा रहता है, जो जामा मस्जिद दिल्ली की याद दिलाती है।
250 से अधिक लोग बैठते हैं इत्तेकाफ में
मुरादाबाद। माह-ए-रमजान के आखिरी अशरे में रोजेदार मस्जिदों में खुदा की इबादत के लिए इत्तेकाफ में बैठते हैं। जामा मस्जिद में 250 से 300 रोजदार इत्तेकाफ में बैठते हैं।
बेहिसाब हैं दीनी किताबें
मुरादाबाद। मजिस्द में दीनी किताबों की भरमार है। कुरआन-ए-पाक के अलावा दीन से जुड़ी तमाम किताबें है। मुकद्दस रमजान में कुरआन-ए-पाक की आयतें गूंजती हैं।