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मानसून मंदिर: ‘जब रोता है पत्थर, तब बरसते हैं इंद्रदेव’, गर्भगृह में टपकती हैं बूंदें, 400 साल का है ये रहस्य

Fri, 29 May 2026 02:06 PM IST
प्रसून शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: एक ऐसा मंदिर, जो आसमान में बादल छाने से कई दिन पहले ही बता देता है कि देश में मानसून कैसा रहेगा! उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में भीतरगांव ब्लॉक के बेहटा बुजुर्ग गांव में भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर इन दिनों फिर से पूरी दुनिया में कौतूहल का विषय बना हुआ है।
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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala

क्या आप एक ऐसे मंदिर के बारे में जानते हैं जिसके सामने आधुनिक विज्ञान, बड़े-बड़े सुपर कंप्यूटर और मौसम वैज्ञानिकों की अत्याधुनिक भविष्यवाणियां भी घुटने टेक देती हैं? एक ऐसा मंदिर, जो आसमान में काले बादलों का नामोनिशान छाने से कई दिन पहले ही यह बता देता है कि इस वर्ष देश में मानसून का मिजाज कैसा रहेगा!
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में भीतरगांव ब्लॉक के बेहटा बुजुर्ग गांव में स्थित अति प्राचीन और चमत्कारी भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर इन दिनों फिर से पूरी दुनिया में कौतूहल और आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।

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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : वीडिओ ग्रैब
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तपती दोपहरी, आसमान से बरसती आग और नौतपा की चिलचिलाती गर्मी के बीच, जहां आम इंसान और पशु-पक्षी बेहाल हैं, वहीं इस रहस्यमयी मंदिर ने देश में मानसूनी बारिश नजदीक होने का सबसे सटीक और पुख्ता संकेत दे दिया है। मंदिर के गर्भगृह के शिखर से बीती 26 मई से पानी की इक्का-दुक्का बूंदें टपकना शुरू हो गई हैं, जिसने ग्रामीणों के चेहरों पर खुशी ला दी है।
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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala

नौतपा के बीच मिला झमाझम बारिश का संकेत

मंदिर के गर्भगृह के शिखर पर एक बेहद दुर्लभ और रहस्यमयी आयताकार पत्थर लगा है। इस पत्थर की महिमा और बनावट ऐसी है कि जब बाहर भीषण गर्मी अपने चरम पर होती है, तब इस पत्थर पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें उभरने लगती हैं। ग्रामीण इस पत्थर को प्रकृति का अनूठा 'मौसम विज्ञान केंद्र' मानते हैं। मानसूनी बारिश आने के तकरीबन बीस दिन पहले इस मंदिर की छत से बूंदें टपकने लगती हैं।

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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala
इस तारीख से बरसेंगे बदरा
फिलहाल इन मानसूनी बूंदों का आकार और घनत्व अभी छोटा है, लेकिन एक सप्ताह बाद इन बूंदों का आकार बड़ा होने का अनुमान है। मंदिर के इस प्राचीन और अचूक गणित के अनुसार, इलाके में आगामी 20 से 25 जून के बीच झमाझम मानसूनी बारिश शुरू होने का पुख्ता अनुमान है। ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि पत्थर से गिरने वाली बूंदों का घनत्व जितना अधिक होगा, इंद्रदेव उतने ही मेहरबान होंगे और बारिश उतनी ही मस्त होगी।
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मंदिर के गर्भगृह से टपकती पानी की बूंद - फोटो : amar ujala

पहली बारिश होते ही पूरी तरह सूख जाता है यह रहस्यमयी पत्थर

इस अटूट चमत्कार की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मानसून आने के 20 दिन पहले टपकने वाला यह पत्थर, बाहर पहली बारिश की फुहार पड़ते ही अंदर से पूरी तरह सूख जाता है। विज्ञान कहता है कि इस बार मानसून लेट होगा या सूखा पड़ेगा, और कई बार विज्ञान की ये बातें गलत भी साबित हो जाती हैं; लेकिन इस मंदिर की भविष्यवाणी कभी फेल नहीं होती।

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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala
यदि पत्थर से टपकने वाली बूंदें छोटी हैं, तो सूखा पड़ने का अंदेशा होता है और अगर बूंदें बड़ी हैं, तो समझो भारी बारिश होने वाली है। सदियां बीत गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन इस मानसूनी पत्थर का रहस्य आज भी उतना ही अटूट है, जिसे देखकर बड़े-बड़े मौसम वैज्ञानिक भी भौचक्के रह जाते हैं।
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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala

9वीं सदी का बौद्ध मठनुमा आकार और सात समंदर पार से आते विदेशी

भगवान जगन्नाथ मंदिर की आयु का सटीक आकलन आज तक कोई नहीं कर पाया है। पुरातत्व विभाग के कई सर्वेक्षणों के बाद भी इसके निर्माण को लेकर कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिले हैं। बौद्ध मठ के आकार में बने इस मंदिर की दीवारें करीब 14 फीट मोटी हैं। इसके गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा की काले चिकने पत्थरों की भव्य और अलौकिक मूर्तियां स्थापित हैं।

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कानपुर का मानसून मंदिर - फोटो : amar ujala
9वीं सदी से अजूबा बना है जगन्नाथ मंदिर
भगवान जगन्नाथ मंदिर की आयु का सटीक आकलन कोई नहीं कर पाया है पुरातत्व विभाग के कई सर्वेक्षण के बाद भी यह कब और किसने बनवाया, इसका कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिले। बौद्ध मठ के आकार में बने इस मंदिर की दीवारें करीब 14 फीट मोटी हैं। इसके गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा की काले चिकने पत्थरों की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं मंदिर के बाहरी हिस्से पर बने मोर के निशान और चक्र को देखकर इसे राजा हर्षवर्धन कालीन 9वीं सदी के होने का अंदाजा लगाया जाता है, जिसका जीर्णोद्धार 11वीं शताब्दी के आसपास हुआ था।
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