अदलहाट। वट सावित्री व्रत सोमवार को मनाया जाएगा। महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली और पति की लंबी उम्र के लिए वृत रखकर वट वृक्ष और देवी गौरी की पूजा करेंगी। वट सावित्री व्रत की मान्यता सावित्री और सत्यवान की कहानी से जुड़ी है।
सावित्री का विवाह सत्यवान से हुआ था। सत्यवान को विवाह के एक साल के बाद मरने का श्राप मिला था। बरगद के पेड़ के नीचे लकड़ी काटते समय उसकी मृत्यु हो गई। सावित्री ने उनकी मृत्यु को स्वीकार नहीं किया।
भगवान यमराज से विद्रोह कर अपने पति के प्राण बचाने के लिए बरगद के पेड़ के नीचे कठोर तपस्या शुरू कर दी। यमराज उसके दृढ संकल्प से प्रभावित हुए और उसे उसके पति का जीवन दान दे दिया।
आचार्य पंडित चंद्रमौली त्रिपाठी ने बताया कि ऐसा माना जाता है कि बरगद के पेड़ में त्रिदेव का वास होता है। जड़ में ब्रह्मा, तने में श्री विष्णु और शाखाओं व पत्तों में भगवान शिव का वास होता है। इसीलिए इसे देव वृक्ष कहा जाता है। ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप में महिलाओं की पूजा के लिए इसी वृक्ष को चुना गया है, क्योंकि यह सबसे अधिक छाया प्रदान करता है।
महिलाएं वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करती हैं और सात बार कच्चा धागा लपेटती हैं। कच्चे धागे को सात बार लपेटना का मतलब है कि पति के साथ उसका रिश्ता सात जन्मों तक मजबूत बना रहेगा। वट सावित्री व्रत की पूजा सोमवार को दोपहर 12:11 बजे से अगले दिन सुबह 8:31 बजे तक की जा सकती है।