फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इंसान की मनमानी पर्यावरण पर पड़ रही भारी

Fri, 05 Jun 2015 12:15 AM IST
ब्यूरो मिर्जापुर अमर उजाला
विज्ञापन
विज्ञापन
पहाड़ों को तोड़ने के लिए हो रही ब्लास्टिंग, गंगा में गिर रहे नालों और अंधाधुंध वनों की कटाई ने जिले में पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ा दिया है। गंगा में नालों के पानी गिरने से घाटों का पानी खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुका है। यहां स्नान करने वाले लोगों को  त्वचा संबंधी रोगों के फैलने की आशंका बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि भीषण गर्मी के बावजूद गंगा स्नान करने वालों की संख्या बेहद कमी होती जा रही है। वनों की कटाई ने जंगलों की हरियाली छीन ली है।
विज्ञापन


जिले में अहरौरा, हलिया, लालगंज, मड़िहान आदि इलाकों में कभी वन हरियाली से आच्छादित हुआ करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। दिनोदिन बढ़ते प्रदूषण के कारण अब जंगल के नाम पर झाड़ियां ही शेष रह गई हैं। अहरौरा के पहाड़ों पर और डगमगपुर में हो रहे ब्लास्टिंग के चलते इन क्षेत्रों से पशु पक्षियों की संख्या में भी गिरावट आई है। अहरौरा के सोनपुर,धुरिया, लालपुर तथा डगमगपुर आदि इलाकों में रोजाना धरती ब्लास्टिंग के कारण कांपती है। इसी क्षेत्र के दानव, सदापुर आदि इलाकों में वनों की कटान जोरों पर है।

ड्रमंडगंज में भैसोर में वन कटाई तथा हलिया में नौगवां पहाड़ी, सुखड़ा पहाड़ी तथा अहुजीकला पहाड़ी पर स्थानीय लोग ही पहाड़ों को समाप्त करने पर तुले हुए हैं। इन इलाकों में पत्थरों और पटिया को सड़क के किनारे बेचा जा रहा है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में ग्रामीण इलाके ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों का भी बड़ा हाथ है। शहर के  जमुनहिया, घोड़े शहीद, पक्का घाट, ओझला पुल, फतहां आदि इलाकों में गंगा में चार से छह की संख्या में नाले का पानी प्रतिदिन निर्बाध गति से गिर रहा है जिसकी रोकथाम के नाम पर कोई प्रयास नहीं हो रहा है। इसकी वजह से गंगा का पानी न केवल प्रदूषित हुआ है बल्कि इसमें नहाने से शरीर में खुजली का अहसास होने लगा है। यही वजह है कि भीषण गर्मी के बावजूद गंगा नहाने वालों की संख्या भी बेहद कम हो गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


प्रतिदिन गंगा दर्शन को पहुंचने वाले राजू अग्रवाल और पंकज खन्ना बताते हैं कि अब तो आचमन के लिए भी एक बार सोचना पड़ता है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें