हजारों वर्षों से ज्ञान प्राप्ति की तपोस्थली विंध्याचल एक ऐसा जागृत पीठ है, जहां वैदिक व वाम मार्गी दोनाें पद्धतियों से पूजन होती है। विंध्याचल ऐसा सिद्ध पीठ है, जहां मां विंध्यवासिनी अपनी दस अन्य शक्तियों के साथ विद्यमान हैं, जिसे दस महाविद्या का प्रधान केंद्र कहा जाता है। यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में ही त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं।
विंध्याचल से गंगा मां विंध्यवासिनी का रज लेकर शिव की नगरी काशी ओर प्रस्थान करतीं हैं। यहीं पर मुनि अगस्त्य ने सभ्यता और संस्कृति के प्रचार प्रसार की ज्ञान यात्रा आरंभ की और यह वही क्षेत्र है, जहां सप्त ऋषियों को ज्ञान प्राप्त हुआ। मां विंध्यवासिनी का पूजन वैदिक रीति से होता है जबकि इनकी दस महाशक्तियों का पूजन वाम मार्गी तांत्रिक पद्धति से होता है। यहां साधना करने वाले को शीघ्र ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।
विंध्य क्षेत्र के त्रिकोण का अपना एक अलग ही महत्व है। किसी अन्य पीठ में ऐसी त्रिकोण यात्रा का विधान नहीं है। यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में ही त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं, जो इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया की देवियां हैं। विंध्याचल के वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र ने बताया कि सांसारिक प्राणियों में रजोगुण की प्रधानता रहती है, अत: सबसे पहले रजोगुणी स्वरूपा महा लक्ष्मी मां विंध्यवासिनी के दर्शन पूजन करके, तमोगुणी स्वरूपा महाकाली का दर्शन करते हैं। बाद में सतो गुणी स्वरूपा महा सरस्वती अष्टभुजा के दर्शन करते हैं।
इन तीनों देवियों का दर्शन त्रिकोण कहलाता है। इस दर्शन का मूल ध्येय है कि रजो तथा तमो गुण को सतो गुण में विलय कर प्राणियों में सतोगुण की प्रधानता हो। त्रिकोण यात्रा में तीनों देवियों की समान दूरी यह इंगित करती है कि जब तक प्राणी मात्र में तीनों गुण अर्थात सत, रज व तम का संतुलन नहीं रहेगा, तब तक उसका संतुलित विकास नहीं हो सकता है।