तेजी से बढ़ रहे गंगा के जलस्तर को देख तटवर्तीय इलाकों के लोगों की धुकधुकी बढ़ गई है। उनको वर्ष 2013 में आई भीषण बाढ़ याद आने लगी है। बाढ़ से घाटों की सीढ़ियां गंगा में समाहित होने लगी हैं।
बुधवार की सांय सात बजे गंगा का जलस्तर 72.730 सेंटीमीटर रिकार्ड किया गया, जबकि खतरे का निशान 77.724 मीटर है। वहीं जिला प्रशासन द्वारा बाढ़ से निपटने का दावा खोखला नजर आ रहा है। वर्तमान समय न तो गंगा घाटों पर बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है और न ही ओवरलोड नावों के संचालन पर ही कोई रोक लगाई गई है।
बुधवार को गंगा के तेज उफान को देख तटवर्तीय इलाके के लोगों को एक बार फिर चिंतित हो उठे।गंगा किनारे अरहर, बाजरा, उड़द, मूंग, मुंगफली, तिल्ली सहित कई सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती हैं, लेकिन गंगा के जलस्तर को देख छानबे, कोन, पड़री, चुनार, सीखड़ के किसान चिंतित नजर आने लगे हैं।
उनको चिंता सता रही है कि यदि वर्ष 2013 की स्थिति फिर आ गई तो मेहनत की गाढ़ी कमाई पानी में बह जाएगी। गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ते रहने से जहां एक ओर घाटों पर स्थित प्राचीन मंदिरों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, वहीं तेजी से कटान का भी खतरा बढ़ता चला जा रहा है। गंगा में पानी बढ़ने से घाटों की सीढ़ियां भी गंगा में समाहित होने लगी हैं। जलस्तर बढ़ने से नदी में बने पीपा पुल को हटवा दिया गया है।
जिससे शहर में आने वालों को शास्त्री पुल से चक्कर काटकर आना पड़ रहा है, लेकिन जिला प्रशासन की लाख कवायद के बाद भी गंगा में ओवरलोड नावों के संचालन पर रोक नहीं लग पा रहा है। नाविक लालच में लोगों की जान को जोखिम में डाल कर इस पार से उस पार और उस पार से इस पार तक पहुंचाते हैं। यदि जलस्तर में ऐसे ही बढ़ोत्तरी होती रही तो गंगा के तटवर्तीय के लोगों को बाढ़ कर कहर झेलना पड़ सकता है। इसे सोंच कर ही उनके रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि पिछली बार की बाढ़ लोग अभी भूल नहीं पाए हैं। उन्होंने अपनी तैयारियों भी शुरु कर दी है। उधर नगर के घाटों पर गंगा का जलस्तर देखने के लिए नगरवासियों की भीड़ जुटी रही।