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जब तक आग धधकती नहीं, पाषाण नहीं पिघला करते

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डा. भुवन मोहिनी - फोटो : MIRZAPUR
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मिर्जापुर। मां विंध्यवासिनी की नगरी में फागुन की सुरमई शाम रविवार को और खूबसूरत हो गई जब अमर उजाला काव्य कैफे में प्रख्यात कवियों ने सुर बांधा। काव्य रस की बारिश हुई तो सब भींगते रहे। कभी खिलखिला कर हंस पड़ते तो कभी शृंगार में सराबोर होते रहे। हंसी-हंसी में कवियों ने व्यवस्था पर चुटीले तंज कसे तो कभी वीर रस से जोश भर दिया। डॉ. भुवन मोहनी की रचना ‘प्यार बिना सब तीरथ सूने क्या काबा, क्या काशी’ लोगों के दिल में उतर गई।
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लालडिग्गी स्थित होटल मिलन पैलेस में सजी शाम में शुभारंभ विकास बौखल ने हास्य की कविताओं से किया। उनकी कविताओं ने दर्शकों को हंसा हंसा कर लोटपोट कर दिया। इसके बाद युवा कवि प्रियांशु गजेंद्र ने हास्य-व्यंग्य के साथ पुरुष विमर्श की कविताओं को प्रस्तुत किया। इसके बाद डॉ. अर्जुन सिसौदिया ने वीर रस की कविताओं से लोगों को देशभक्ति के लिए मर मिटने वाले जवानों की याद दिलाई और जमकर तालियां बटोरीं। साथ ही कविताओं के माध्यम से देश खिलाफी की बात करने वालों पर कुठाराघात किया। इसके बाद डॉ. भुवन मोहनी ने माइक थामा तो लोगों के दिलों की धड़कनें थम सी गईं। महफ़िल में अलग सा जोश छा गया। भुवन मोहनी ने प्रेम रस की कविताओं से दिलों के तार को छेड़ा। खासतौर से बुजुर्गों को लेकर चुटीले अंदाज ने दिल जीत लिया। इसके बाद डॉ. कलीम कैसर ने अपनी संजीदा अदाओं और दिल को छू लेने वाली कविताओं से कार्यक्रम का समापन किया। संचालन की जिम्मेदारी प्रियांशु गजेंद्र ने संभाली।
इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि आईजी पीयूष श्रीवास्तव, विशिष्ट अतिथि डीएम सुशील कुमार पटेल, एसपी डॉ. धर्मवीर सिंह व नगर पालिका अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। सभी अतिथियों को बुके देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर एडीएम यूपी सिंह, सीएमओ डॉ. ओपी तिवारी, भाजपा जिलाध्यक्ष ब्रजभूषण सिंह, सपा जिलाध्यक्ष देवी चौधरी, पूर्व अध्यक्ष डीबीए प्रेमकांत श्रीवास्तव, रामलीला कमेटी बरियाघाट अध्यक्ष रामकुमार विश्वकर्मा, गणेश गंभीर, लल्लू तिवारी, भोलानाथ कुशवाहा, शुभम श्रीवास्तव, ओउम, रमाशंकर शुक्ला, राजेंद्र तिवारी, डॉ अवनीश पांडेय, डॉ अभिजीत कसेरा, कृष्णानंद कसेरा, नीलेश पुरवार, जगदीश पटेल, संतोष गोयल, संजय गहरवार, मनोज खंडेलवाल, रवींद्र जायसवाल आदि रहे।
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उन आंखों में डूब मरो, अपनी चाहत में हल हो जाओ। इश्क करो तो पागल कर दो या खुद पागल हो जाओ... से डॉ. कलीम कैसर हर दिल को छू गए। देश के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि बस इतनी सी तमन्ना है, हिंदुस्तान से उठे और हिंदुस्तान में मिले। सात बच्चे पाल सकती है मां, सात बच्चे नहीं रख सकते मां का ख्याल... से आज के परिवेश में मां की महत्ता और दर्द को साझा रूप से बयां कर दिया। बुराई पर अच्छाई की जीत को बताते हुए उन्होंने सुनाया, ये तुम भी देखना व्यभिचारी शासन हार जाएगा, हमारे रामजी से रावण हार जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने भावनाओं को कुरेदती कई रचनाएं प्रस्तुत कीं। अपनी अभिव्यक्ति के समापन में उन्होंने लोगों के हृदय को छू लिया। क्या कहा आपने उंगलियां जल गईं, देखिए उस तरफ बस्तियां जल गईं। आग जैसा बदन गहरे पानी में था, हर समंदर की सब मछलियां जल गईं... से उन्होंने समापन किया। लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट देर तक उनका इस्तकबाल करती रही।
काव्य कैफे में रूमानी और शृंगार के बीच डॉ. अर्जुन सिसौदिया ने वीर रस की ऐसी समा जलाई कि महफिल में जोश भर गया। जोरदार आवाज के साथ हुई दमदार प्रस्तुति ने वातावरण का तापमान बढ़ा दिया।
सत्तर वर्ष के गणतंत्र तुम्हारी जय हो से अपनी पारी का आगाज करते हुए डॉ. सिसौदिया ने कहा कि 70 वर्षों से जब नहीं हटा अंधियारा, किससे करे शिकायत जनता, दोष है अपना सारा सुनाकर भारतीय जनता की विवशता को सामने लाया। आम आदमी के संकट का जिक्र करते हुए कहा कि आंखें बिकी हैं, सांसें बिकी हैं। अंतिम व्यक्ति तक विकास की गंगा पहुंचाने वाले नारों की बात कहते हुए डॉ. सिसौदिया ने उस पर भी अपनी बातें कहीं। जो लोग नित्य यह कहते हैं कि हर समय परेशानी है। उनको समझाते हुए उन्होंने सुनाया, युद्ध नहीं जिनके जीवन में वे भी बड़े अभागे होंगे। या तो प्रण तोड़ा होगा या रण से भागे होंगे। अपना- अपना युद्ध सभी को लड़ना ही पड़ता है। कौन भला स्वीकार करेगा, जीवन एक संग्राम नहीं है। इसके बाद उन्होंने अभिनंदन की वापसी को लेकर अपनी रचना प्रस्तुत की। भारतीय सैनिकों की कार्रवाई को उचित बताते हुए कहा कि सियासत ने सदा से की है अपनी मनमानी, इस बार हमारे शेरों को भी करने दो अपनी मनमानी। कन्हैया को धिक्कारते हुए कहा कि जन्म देकर तुझे तेरी मइया भी लजाई होगी। कैसा है कन्हैया तूने तो कंस को भी लजा दिया। वीर अब्दुल हमीद की वीरता का जिक्र करते हुए उन पर भी कविता सुनाईं। इसके बाद महाभारत युद्ध का प्रसंग सुनाया। जब श्रीकृष्ण दुर्योधन से संधि प्रस्ताव लेकर जाते हैं तो वहां क्या होता है। इसको बखूबी उन्होंने प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में कई बार ऐसा समय आया जब लोग एकदम से रोमांचित हो गए।
खूबसूरत गीतों व मनमोहक अदाओं के साथ ही हाजिर जवाबी से खुद की पहचान बनाने वाली डॉ. भुवन मोहिनी ने रविवार की शाम काव्य कैफे में अपने रूमानी गीतों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। बीच-बीच में कुछ व्यंग्य तो कभी चुटकियों के साथ उन्होंने रात तक लोगों को सम्मोहित करके रखा।
बेटी बचाओ की बात से शुरू करते हुए उन्होंने बेटियों के महत्व को सुनाया। उन्होंने कहा कि बेटियों के न होने का दर्द बहुत बड़ा होता है। सकल कल्याण की कोई तलहटी नहीं होती, हरेक पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती। छेड़छाड़ पर उन्होंने सुनाया, तना हो सिर पर जब छप्पर तो सावन क्या बिगाड़ेगा, दुपट्टा हो बदन पर जब तो दु:शासन क्या बिगाड़ेगा। माहौल को रूमानियत की ओर मोड़ते हुए कहा, दिल में रोशन कई चांद तारे हुए, खूबसूरत से कितने इशारे हुए। नैनों ने नैनों से जाने क्या कह दिया, हम तुम्हारे हुए तुम हमारे हुए। इसके साथ ही इक अधूरी कहानी तो मुझमें भी है, धड़कते दिल की जवानी तो मुझमें भी है। तुम जो हुस्न की शिवाला बनी प्रेम में, इक मीरा दीवानी तो मुझमें भी है, सुनाकर महफिल का दिल धड़का दिया। व्यंग्य करते हुए उन्होंने फेसबुक की डीपी पर एक रचना सुनाई, डीपी जिसकी देख देखकर हुए निहाल, जिसको समझा 16 साल की वह निकली 70 साल। इसके साथ ही योगी व मोदी के साथ महबूबा को जोड़कर सुनाया, आजादी के बाद हुआ है पहली बार अजूबा, योगी के महबूब बने और मोदी के महबूबा। फिर से शृंगार की ओर लौटते हुए सुनाया, किसी जुल्फ का बादल होना कितना अच्छा लगता है, किसी आंख का काजल होना कितना अच्छा लगता है। नैनों से नैनों ने जाने क्या कह दिया, चांद को पाने की खिड़की खुली। इसके साथ हो गई हो गई रे बावरिया हो गई व चल चल जैसे गीत सुनाकर श्रोताओं की वाहवाही लूटी।
संचालन कर रहे गजेंद्र प्रियांशु बीच- बीच में चुटीले अंदाजों से लोगों को हंसाते रहे। अपनी छोटी- छोटी रचनाओं से वह लोगों को उत्साहित करते रहे।
नारी दर्शन को प्रस्तुत करते हुए सुनाया, इधर, कंटीली देह है, उधर दिल गुलाब है, ये मेरा दिल भी कम नहीं, लखनवी नवाब है। काला धन पर व्यंग्य करते हुए अपने प्रिय गीत, इतने निर्मोही कैसे सजन हो गए, किसकी बाहों में जाकर मगन हो गए। लौट कर न आए परदेश से, आदमी न हुए काला धन हो गए, सुनाया तो वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके साथ ही अपने गीत सिया तेरा अभिशापित है राम सुनाया तो वातावरण गमगीन हो गया। युग- युग का संकल्प अटल था, मुझमें मेरा राम प्रबल था आदि सुनाकर लोगों को सम्मोहित कर दिया। बोल रहा पौरुष की भाषा, मेरा नन्हा सा प्रत्याशा आदि ने लोगों को विचार मग्न कर दिया। नाव तुम्ही पतवार तुम्ही, तुम्ही वीर हो देवी। कोई कहे कुछ भी कह दे तुम्ही तकदीर हो देवी के साथ ही बीच- बीच में हंसी की फुलझड़ी भी छोड़ते रहे।
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