शेरवां (मिर्जापुर)। क्षेत्र के शेरवां गांव में साधारण ब्राह्मण शुकदेव के आंगन में खिले कमल की सुगंध से पूरा पूर्वांचल ही नहीं देश-विदेश भी सुगंधित हो उठा था। जहां एक ओर हिंदी साहित्य भोजपुरी पतझड़ के दौर से गुजर रहा था तो हरिराम द्विवेदी ने लाल पलास के फूल की तरह लोक साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य किया। हिंदी साहित्य के जरिए क्षेत्र का पताका पूरे देश में फैलाया।
शेरवां गांव के पंडित शुकदेव द्विवेदी के आंगन में तीसरे पुत्र के रूप में 12 मार्च 1936 को जन्म लेने वाले हरिराम द्विवेदी को वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान से भी नवाजा गया था। इनकी प्राथमिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल और जूनियर हाईस्कूल चौकिया, हाईस्कूल की परीक्षा कमच्छा वाराणसी, इंटरमीडिएट पीडीएनडी इंटरमीडिएट कॉलेज चुनार, बीए काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी, एमए काशी विद्यापीठ एवं बीएड काशी हिंदू विश्वविद्यालय से की थी। लोक संगीत में रूचि रखने वाले हरिराम द्विवेदी साल 1958 में आकाशवाणी रेडियो इलाहाबाद में ग्रामीण कार्यक्रम कृषि जगत में प्रवेश कर हरि भईया के नाम से प्रख्यात हुए थे। सन् 1967 से 72 तक आकाशवाणी रामपुर एवं गोरखपुर में सेवा की। फिर आकाशवाणी वाराणसी रेडियो कलाकार के रूप में सन् 1976 में आ गए। लगभग तीस वर्षो तक आकाशवाणी की प्रसारण सेवा में संबंध रखने के बाद मार्च 1994 में सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के बाद वाराणसी स्थित अजमतगढ़ पैलेस मोतीझील वाराणसी में रहकर जीवन यापन कर रहे थे। इनकी दो पुत्रियां और दो पुत्र हैं। हरिराम द्विवेदी उर्फ हरि भैया साहित्यिक सांस्कृतिक एवं कलात्मक लेखन में अभिरुचि रखते हैं। साथ ही हिंदी एवं लोक भाषा भोजपुरी के स्थापित कवियों में प्रतिष्ठित हैं। हरि भईया को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से राहुल सांकृत्यान पुरस्कार 1983 के लिए सम्मानित किया गया था। हिंदी साहित्य सारस्वत सम्मान, लोक पुरूष सम्मान, साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान, 2015 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डिस्टिंगविस एल्यूमनस अवॉर्ड, विश्व भोजपुरी संघ द्वारा पुरबिया गौरव सम्मान, वर्ष 2011 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन द्वारा भोजपुरी का सर्वोच्च सम्मान सहित अनेक सम्मान से नवाजे गए थे। हरि भईया के बेटे राजेश द्विवेदी, अरूण द्विवेदी ने बताया कि पिता जी को पद्मश्री एवं पद्मविभूषण सम्मान के लिए पत्रावली शासन स्तर पर तैयार हो रही थी। उनका सपना अधूरा रह गया है। ज्ञात हो कि हरि भईया की एक दर्जन से अधिक कुल चौदह हिंदी एवं भोजपुरी गीतों की हिंदी बाल साहित्य कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। इसमें नदियां गइल दुबराय, अंगनइया, जीवनदायिनी गंगा, पानी कहै कहानी, हाशिए का दर्द, पातारी वीर, फुलवारी, रमता जोगी, बैन फकीरा, लोकगीत का दोहावली, हे देखा हो, हिंदी गजलों सहित विविध विषयों पर लिखी रचनाओं का संग्रह है। हरि भईया को दो दशक पूर्व आकाशवाणी पोर्ट ब्लेयर के बुलाने पर अंडमान निकोबार सहित कलकत्ता बंदरगाह पर भी अपने कविता की छवि को वहां के जनमानस तक पहुंचाया है। लोकगीत की हर विधा कजरी, सोहर, खेलवना, लोरी, झूमर, सहरवा, लाचारी, चइता, फाग गीतों पर मजबूत पकड़ रखते थे। हरि भईया की गीत शादी विवाह में जब मां बहनें गातीं हैं कि बसवा से ए बेटी डोलवा फनाला होई जाला घर सुनसान, बिटिया के बाबा से पूछा न कइसन मडवा का बिहान इन गीतों को सुनकर आंखों में आंसू आ जाते हैं। भोजपुरी फिल्म बॉर्डर में भी इनकी गीत काफी लोकप्रिय हुई है।
88 साल की उम्र में लिया अंतिम सांस
हरि राम द्विवेदी उर्फ हरि भैया ने 88 वर्ष की अवस्था में वाराणसी के अजमतगढ़ पैलेस मोतीझिल में अंतिम सांस ली। हरि भैया काफी समय से बीमार चल रहे थे। सोमवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना पर क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। निधन पर राजेश द्विवेदी, श्रीकांत द्विवेदी, डॉ. मन्नू यादव, ओमप्रकाश मिर्जापुरी, रंगनाथ द्विवेदी, मनोज द्विवेदी, शितेश द्विवेदी, राजेन्द्र चौधरी, उमेश द्विवेदी, बंशीधर चतुर्वेदी, मस्तराम द्विवेदी, जयप्रकाश मिश्रा, ओमप्रकाश दूबे सहित दर्जनों साहित्य प्रेमियों ने शोक व्यक्त किया है।