कहा कि किसी भी साधक की साधना तब तक अधूरी मानी जाएगी जब तक वह विंध्य धाम में आकर मां के चरण रज को प्राप्त नहीं कर लेता। विंध्याचल की भूमि पर भारत वर्षके महान संतों ने अपनी साधना के क्षण बिताए हैं। आदिगुरू शंकराचार्य , स्वामी करपात्री महाराज, तैलंग स्वामी, अवधूत भगवान राम, माता आनंदमयी मां महागुरु गोरखनाथ बाबा, योगीराज देवरहा बाबा जैसे संतों ने इस भूमि पर साधना की है।
विंध्य क्षेत्र में दुर्लभ त्रिकोण
शाक्त मतावलंबियों ने भारत वर्ष में जिस वृहत् त्रिकोण की परिकल्पना की है उसके केंद्र में मां विंध्यवासिनी ही हैं। इस वृहत् त्रिकोण के एक कोण पर माता विंध्यवासिनी तो दूसरे कोण पर जम्मू की वैष्णवी माता तथा तीसरे कोण में कामरूप कामाख्या की देवी विराजती हैं। ऐसा माना जाता है कि केदारेश्वर शिव के तीनों नेत्रों के कोणों पर ही ये तीनों शक्तिपीठ विद्यमान हैं।
ऐसा ही एक दुर्लभ त्रिकोण विंध्य क्षेत्र में भी स्थित है। इस त्रिकोण के मध्य में लक्ष्मी स्वरूपा इक्षा की देवी मां विंध्यवासिनी हैं तथा दूसरे कोण पर कालीखोह वाली काली माता स्थिति हैं। तीसरे कोण पर सरस्वती स्वरूपा ज्ञान की देवी मां अष्टभुजा विराजमान हैं।
विंध्याचल में श्रद्धा का सैलाब (फाइल)
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पौराणिक मान्यता है कि मां विंध्यवासिनी के दर्शनोपरांत त्रिकोण यात्रा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। विंध्यधाम को सिद्धपीठ भी कहा जाता है। माता की असीम कृपा शक्ति अल्प समय में भक्तों को सिद्धियों को देनें वाला है। विंध्य पर्वत का ईशान कोण विंध्य क्षेत्र में ही माना जाता है।
इसी कोण पर मां विंध्यवासिनी विराजमान हैं, जहां गंगा नदी विंध्य पर्वत को स्पर्श करते हुए बहती है। मान्यता है कि नवरात्र के दिनों में आज भी मां विंध्यवासिनी भक्तों को दर्शन देने के लिए पताका पर विराजती हैं। विंध्याचल ही एकमात्र ऐसा शक्तिपीठ है, जहां देवी के संपूर्ण विग्रह के दर्शन होते है। मां विंध्यवासिनी का यह मंदिर देश के 108 सिद्धपीठों में से एक है।
शक्ति का शिव से मिलन भागीरथी गंगा के माध्यम से ही संभव हो पाता है। क्योंकि पतित पावनी गंगा विंध्यधाम से मां विंध्यवासिनी के चरणों की रज को लेकर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की ओर प्रस्थान करती हैं। काशी में गंग द्वार से गंगाधर बाबा विश्वनाथ का जब जलाभिषेक होता है तो ये शक्ति और शिव के मिलन का दुर्लभ सुयोग होता है।
विंध्यधाम में अनेक रहस्य छिपे हुए हैं। जब कोई साधक तन्मय होकर भगवती की आराधना करता है, तब माता की कृपा से इन रहस्यों पर से पर्दा अपने आप ही हटता चला जाता है। रहस्यों को देख व जान कर भक्त स्वर्ग की आनन्दानुभूति करता है। यहां देवी का अमोघ स्नेह व आशीर्वाद भक्तों पर सदैव बरसता रहता है।
महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज ने अपनी जीवनगाथा में विंध्याचल में अपनी साधना के अनुभवों का वर्णन किया है। कविराज के अनन्य भक्त डॉ. भगवती शरण सिंह ने उनके संस्मरणों को अपनी पुस्तक 'मनीषी की लोकयात्रा' में विस्तार से लिखा है। विंध्य क्षेत्र का कण-कण देवीय उर्जा का स्त्रोत है। यहां साधना करने वाले भक्तों को शीघ्र ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती है।