घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूुं मैं... यही कहा जा सकता है पांच वर्ष तक मटके के भीतर मुंह डाल कर घुंघरू की आवाज निकालने का भगीरथ प्रयास करने वाले एहसान भारती के बारे में। गिनीज बुक आफ रिकार्ड में नाम दर्ज करा चुके विश्व के मशहूर कलाकार एहसान भारती ने खुद को बड़ा कलाकार नहीं मानते।
कहते हैं कि दुनिया में व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की पूजा होती है। कला एक ऐसी चीज है जो लोगों को सिर्फ शोहरत नहीं प्रदान करती बल्कि लाखों लोगों के जीवन में संगीत के माध्यम से शक्ति का संचार कर देती है।
गले की आवाज से घुंघरू बजाने के लिए दुनिया भर में ख्याति प्राप्त कर चुके एहसान भारती मंगलवार को विंध्य की धरा पर कला को साधना के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आए थे। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि संगीत एक ऐसा माध्यम है। जो दुनिया में मानवता का संदेश फैलाता है। जब संगीत का जादू फिजा में फैलती है तो क्या हिंदू क्या मुसलमान, क्या सिख और ईसाई सभी को एक सुर में पिरो देती है।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मेरठ निवासी एहसान भारती का जन्म 14 सितंबर 1957 में हुआ। उन्होंने मात्र मैट्रिक तक की शिक्षा हासिल की हैं लेकिन कला को सिखने के लिए मुल्ला हकीम मौजा खुराना, अमीर खान कैराना घराना, बदरूददीन बेड़ भाई व अजीज नागा समेत अन्य संगीत संस्थाओं से तालीम ली।
इनके कला की सबसे बड़ी महारत यह है कि दुनिया में जितने भी कलाकार होते है वह वाद्य्य यंत्रों के माध्यम से सुरों को प्रस्तुति करते हैं लेकिन एहसान अपने गले से ऐसा सुर निकालते हैं जो घुंघरू की आवाज में तब्दील हो जाती है। जिसे सुनकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं। अबतक एहसान भारती कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।
जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भारत गौरव का एवार्ड दिया गया है। इन्होंने कई फिल्मों में अपनी आवाज तो दी ही है जिसमें सूर्यकांत, दो दिनों की धड़कन, मार्शल समेत अन्य फिल्में शामिल हैं। साथ ही कई एलबम और कैसे माध्यम से अपना जलवा बिखरते रहते हैं। इन्होंने भारतीय सांस्कृति विरारस को दुनिया के कई देशों पाकिस्तान, दुबई आदि देशों में प्रचारित एवं प्रसारित करने का काम किया है।