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शहीद की अंतिम यात्रा es

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शहीद होकर अमर हो गए रवि सिंह, लाल को अंतिम विदाई
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मिर्जापुर। जम्मू कश्मीर के बारामुला में शहीद हुए रवि सिंह को सैन्य सम्मान के साथ जिगना के गौरा गांव में रामलीला मैदान पर अंतिम विदाई दी गई। हजारों की संख्या में उमड़े लोगों ने भारत माता की जय और देशभक्ति के नारों से अपने लाल के अंतिम बार दर्शन किए। पिता संजय सिंह ने गौरा के रामलीला मैदान में शहीद पुत्र रवि सिंह को मुखाग्नि दी। चिता को अग्नि लगते ही एक पल के लिए पूरा माहौल गमगीन हो गया।
वाराणसी से सुबह सवा छह बजे सेना के जवान अधिकारियों के साथ शहीद का पार्थिव शरीर लेकर रवाना हुए। करीब आठ बजे काफिला जिले की सीमा में प्रवेश किया। जिले में प्रवेश करने के बाद ही जगह-जगह काफिले का स्वागत किया गया। शहीद का शव 11:50 पर पैतृक आवास पर पहुंचा। वहां माता-पिता, पत्नी और परिजनों के दर्शन के उपरांत पार्थिव शरीर को रामलीला मैदान 12:25 पर पहुंचा। वहां पर राजनीतिक पार्टियों के नेताओं संग प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी। इसके बाद गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। 39 जीटीसी के जवानों ने अंतिम सलामी दी। शहीद के अंतिम दर्शन के लिए लोग पहुंचते रहे। गंगा के समीप रामलीला मैदान में हो रहे अंतिम संस्कार कार्यक्रम में पहुंचने के लिए चारों तरफ से लोग आते जाते रहे। हर तरफ, खेतों में केवल लोग आते जाते दिख रहे थे। अंतिम संस्कार के दौरान शहीद का पूरा परिवार मौजूद रहा। इस अवसर पर जनप्रतिनिधि, अधिकारी, समाजसेवी बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
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सुबह 10 बजे के करीब पार्थिव शरीर लेकर आ रहा काफिला जिगना थाने के पास पहुंच गया था। इसके बाद सात किलोमीटर अंदर गौरा गांव जाना था। वैसे तो जिले में प्रवेश करने के बाद से ही जगह-जगह लोग तिरंगा लेकर स्वागत के लिए खड़े थे, पर जिगना थाने तक पचास हजार की भीड़ हो गई। शव लेकर चल रहे काफिले की रफ्तार धीमी हो गई। हाल ये रहा कि जितना समय काफिले को वाराणसी से मिर्जापुर आने में लगा। उतना समय गांव के अंदर घर तक पहुंचने के लिए सात किमी का सफर तय करने में लगा। अगुवाई कर रहे 39 जीटीसी के वाहन साथ ही प्रशासन, राजनीतिक पार्टी व बड़ी संख्या में आम लोगों के वाहन काफिले में चल रहे थे। जिगना से गैपुरा की ओर वाहन मुड़ते ही काफिला लगभग पांच किलोमीटर तक लंबा हो गया। जिगना से मुड़ते ही काफिला जैसे ही फ्लाईओवर पर चढ़ा तो जाम लग गया। यहां से गांव की दूरी तो सात किलोमीटर थी पर लोगों की उमड़ती भावनाओं के चलते शहीद के घर तक पहुंचने में दो घंटे लग गए।
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