आधुनिकता की चमक-दमक के सहज उपलब्धता के सामने नाट्य मंच आहत हो नए-नए उपचार शोध के अभाव में शिथिल पड़ गए। यह कहना है जिले के वयोवृद्ध रंगमंच कलाकार महेश्वर पति त्रिपाठी का ।
विंध्याचल के पं. महेश्वरपति त्रिपाठी बाल्यावस्था से ही रंगमंच व शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए हैं।
रंगमंच के धरोहर समान पंडित जी के सैकड़ाें शिष्य अब तक इनसे शिक्षा ग्रहण कर देश-विदेश में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि पा रहे हैं।
श्री त्रिपाठी बताते हैं कि जनपद में प्रेमघन नागरी नाट्य समिति, विंध्याचल में श्री विंध्य नाट्यम रामलीला तथा नाट्य समिति प्रदर्शन में रत रहे।
विंध्य नाट्यम भी साधन के अभाव में 1990 में शिथिल पड़ गया सच पूछा जाए तो विंध्य मंडल प्रेक्षागृह के अभाव, हिंदी साहित्य के नाटकाें का अकाल, पंडाल, मंच रचना से लेकर मंच तक भारी धनराशि के व्यय संसाधनाें की अनुपलब्धता आड़े आती रही।
श्री त्रिपाठी ने बताया कि वर्तमान परिवेश में मनोरंजन के तरह-तरह के साधन के नतीजतन हिंदी नाट्य मंच को एक झटका लगा और स्तरीय प्रस्तुतियां कम देखने को मिलने लगीं।
जो नाटकाें के लिए समर्पित थे, वे जमीन से जुड़े अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे।
पंडित जी ने बताया कि जमाना चाहे जो भी हो लेकिन नाटक तथा लोक रंगमंच की असली पहचान के लिए हमे नाट्य रंगमंच से जुड़ना होगा।
परंपरपा और प्रयोग के मणिकांचन से जो भारतीय मंच विकसित हो रहा है, उसे मंडल के कलाकाराें को स्वीकारना होगा।
सन् 1954 के बाद रामलीला का मंचन नवयुवक प्रेमघन नागरी नाट्य समिति तथा त्रिमोहानी मुहल्ले के उत्साही नवयुवकाें, महिलाआें द्वारा बाबू बिहारी लाल तथा नत्थी लाल शर्मा के नेतृत्व में एवं शंकर लाल जोशी के निर्देशन में स्तरीय आदर्श रामलीला का अव्यावसायिक मंचन आरंभ हुआ।
श्री त्रिपाठी ने बताया कि शंकर लाल जोशी के निधन के बाद मुझे भी रामलीला निर्देशन का सौभाग्य मिला, जिससे रूढ़ि से हट कर मंचन में कुछ परिवर्तन आया।
बताया कि रामलीला संगीत प्रधान है ही पर कुछ नए प्रयोगों से आकर्षण बढ़ा और प्रसिद्धि भी मिली।