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Mirzapur News: किराये की कोख में पल रहीं गंगातीरी और साहीवाल की उच्च नस्लें

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मिर्जापुर। साहीवाल और गंगा तीरी की उच्च नस्लों वाले बछड़े किराये की कोख में पलेंगे। सरोगेसी विधि पर आधारित यह प्रयोग बीएचयू के बरकछा स्थित राजीव गांधी दक्षिणी परिसर के चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय में किया रहा है। करीब 27 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के तहत चार घुमंतू गायों पर यह प्रयोग किया जा रहा है। पायलट प्रोजेक्ट के सफल होने पर जिले के विभिन्न हिस्सों में बसे किसानों को इससे जोड़ा जाएगा। ताकि उन्हें अच्छी नस्लों के बछड़े मिल सकें और भविष्य में वे परिवार का आर्थिक आधार बन सकें।
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चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय में पशुओं के नस्लों के विकास को लेकर कई प्रयोग चल रहे हैं। इनमें से एक है सरोगेसी के जरिये अच्छी नस्लों के बछड़े पैदा करना। सहायक आचार्य डॉ. उत्कर्ष त्रिपाठी ने बताया कि मिर्जापुर के मड़िहान, राजगढ़, अहरौरा, हलिया सहित कई इलाकों में लोग बड़ी संख्या में गाय पालते हैं। देसी नस्ल की गायें आधा से दो लीटर तक ही दूध देती हैं, जबकि साहीवाल और गंगातीरी जैसी उच्च नस्लों वाली गायों के दूध की मात्रा ज्यादा होती है और प्रोटीन और फैट से भरपूर होती है। शुद्ध नस्ल की गायें भी नहीं मिल पा रही हैं। इसीलिए अच्छी नस्ल के गायों के संरक्षण और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इसे पहुंचाने के लिए यह योजना शुरू की गई है। एक गाय अपने जीवन काल में सात से नौ बछड़े देती है। परंतु सरोगेसी के जरिये एक समय में कई बछड़े पैदा किए जा सकते हैं।



अक्सर दूध न देने वाली गायों को पशु पालक छोड़ देते हैं। इसके चलते वे दर-दर भटकने को विवश हो जाती हैं। यही पशु गोकशी का शिकार भी होती हैं। सरोगेसी के लिए केवल अच्छे गर्भ की जरूरत होती है। दर-दर भटक रहीं दूध न देने वाली गायों को सरोगेसी के लिए प्राथमिकता दी जा रही है। ताकि उन्हें भी संरक्षण और अच्छा पोषण मिल सके। सर्वप्रथम उच्च नस्ल की साहीवाल अथवा गंगातीरी को हीट ट्रीटमेंट दिया जाता है। हार्मोन ट्रीटमेंट के जरिये कई अंडाणु तैयार हो जाते हैं। उन्हें फ्लशिंग मेथड से बाहर निकाल लेते हैं। फिर उच्च नस्ल के सांड़ से अंडाणुओं को लैब में निशेचित कराया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद कई भ्रूण मिल जाते हैं। जिसे सीमेन के जरिये किसी भी सामान्य गाय में डाल दिया जाता है। गाय के गर्भ में पहले वाले बछड़े को पोषण और जरूरी हीट मिलेगी, जबकि उसके अंदर जो गुण होगा, वह उच्च नस्ल वाली गाय और सांड़ का होगा। नौ महीने नौ दिन बाद पैदा होने वाला बछड़ा उच्च नस्ल का होगा। सहायक आचार्य डॉ. मनीष कुमार का कहना है कि सरोगेसी विधि से एक समय में कई उच्च नस्ल के बछड़े प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे देश में उच्च कोटि की नस्ल की साहीवाल और गंगातीरी के संरक्षण और संवर्धन का प्रयास किया जा रहा है।
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