जलनिकासी की समुचित व्यवस्था न होने पर उठाए गंभीर सवाल
संवाद न्यूज एजेंसी
मिर्जापुर। बुधवार दोपहर हुई बारिश के बाद कलेक्ट्रेट परिसर के कई हिस्सों में जलभराव की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। विशेष रूप से खनिज विभाग के सामने और कचहरी के मुख्य प्रवेश द्वार पर पानी भर जाने से अधिवक्ताओं, वादकारियों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों को आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
परिसर में जलनिकासी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण लोगों को गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ा। अधिवक्ताओं ने इस स्थिति पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि जनपद के प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक परिसर में प्रत्येक वर्ष बरसात के दौरान जलभराव की समस्या उत्पन्न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना था कि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के बावजूद यदि कलेक्ट्रेट परिसर जलमग्न हो जाता है तो यह संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
अधिवक्ता आयुष सिंह ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर में प्रतिदिन हजारों की संख्या में अधिवक्ता, वादकारी और आमजन आते हैं। जलभराव के कारण उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। प्रशासन को स्थायी जलनिकासी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।
अधिवक्ता संदीप तिवारी ने कहा कि वर्षा के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर तालाब का रूप ले लेता है, जो प्रशासनिक उदासीनता का प्रमाण है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
अधिवक्ता हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि न्यायालय परिसर तक पहुंचने वाले अधिवक्ताओं और वादकारियों को जलभराव के बीच होकर गुजरना पड़ रहा है, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। उन्होंने संबंधित विभागों से इस ओर तत्काल ध्यान देने की मांग की।
अधिवक्ता आशीष त्रिपाठी ने कहा कि प्रत्येक वर्ष बरसात में यही स्थिति देखने को मिलती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते। इसे उन्होंने चिंताजनक बताया।
अधिवक्ता मदन मोहन मिश्रा ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर की गरिमा के अनुरूप आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, जलनिकासी की समुचित व्यवस्था का अभाव गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
अधिवक्ताओं ने जिलाधिकारी से मांग की कि कलेक्ट्रेट परिसर का तत्काल निरीक्षण कराकर जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान कराया जाए तथा प्रभावी जलनिकासी व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे अधिवक्ताओं, वादकारियों और आम नागरिकों को भविष्य में इस प्रकार की कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।