जिले की सौ साल से अधिक पुरानी रंगमंच की परंपरा अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। पहले रंगमंच का प्रदर्शन कलाकार कला के रूप में करते थे, लेकिन अब छोटे शहरों में इसका कोई क्षेत्र नहीं रह गया है। रंगमंच को अब लोग इसे कमतर नजर से देख रहे हैं, इसको कला के रूप में नहीं देखा जा रहा है। अगर कलाकार कुछ करना चाहता है तो संसाधन नहीं मिलता है। अगर कलाकारों को प्रोत्साहित एवं प्रशिक्षित किया जाए तो रंगमंच की स्थिति सुधर सकती है।
जनपद के कला साधकों का मानना है कि रंगमंच और उससे जुड़े कला साधकों को यदि उचित संसाधन व प्रशिक्षण मिलने की व्यवस्था हो जाए तो यह परंपरा इतिहास दोहरा सकती है। कोन ब्लाक के तिलठी गांव निवासी शिवजी दूबे के पुत्र एवं रंगमंच के वरिष्ठ कलाकार शुभम दूबे ने बताया कि रंगमंच समाज का एक आइना है। रंगमंच जब लोगों की सच्चाईयों को सामने लाती है तो उसे समाज द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है, क्योंकि लोग खुद के अस्तित्व की चेतना से काफी दूर हैं।
समाज से सामना करने की हिम्मत लोगों में अब पैदा नहीं होती है, जिसके कारण अपने शहर व समाज में रंगमंच के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण कला साधक भटकने को मजबूर हैं। उचित संसाधन का न होना इसके विलुप्त का कारण है। अभी तक नगर में रंगमंच के लिए बीजारोपण नहीं हो पाया है, जिससे नई पीढ़ी रंगमंच से काफी दूर होती चली जा रही है।
रंगमंच से जुड़े नगर के दुर्गा देवी मुहल्ला निवासी नीरज वर्मा ने बताया कि रंगमंच का अस्तित्व फिर से वापस लाने के लिए समाज को जागरूक होकर इसको बढ़ावा देना होगा, जिससे उदयीमान कलाकारों को सही मंच मुहैया हो पाए।
वर्तमान में रंगमंच के कलाकारों का टोटा है, क्योंकि उनके प्रशिक्षण के लिए कोई संसाधन मुहैया नहीं है। रंगमंच से जुड़े नगर के विजय सागर ने बताया कि पहले रंगमंच की बात ही कुछ और थी, लोग इस कला को बड़े ही इज्जत से देखते थे, लेकिन बदलते स्वरूप और आधुनिक युग में इस कला को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है।
रंगमंच से जुड़े नगर के धन प्रसाद ने बताया कि नगर में रंगमंच की प्रथा वर्षों पुरानी है, लेकिन वर्तमान में इसको जीवित रखने के लिए कलाकार जद्दोजहद कर रहे हैं।