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मिर्जापुर के डॉक्टर की उपलब्धि: अमेरिका में विकसित नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को भारत में मिला पेटेंट, जानें- खास

Sat, 05 Sep 2026 05:55 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, मिर्जापुर।

सार

मिर्जापुर निवासी डॉ. मयंक सिंह और उनकी अमेरिकी वैज्ञानिक टीम ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अमेरिका में विकसित नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को भारत में पेटेंट मिला। यह तकनीक आधुनिक दवाओं, प्राकृतिक औषधियों, पौष्टिक उत्पादों, खाद्य एवं पेय पदार्थों, पशु चिकित्सा तथा कृषि जैसे कई क्षेत्रों में उपयोगी है। 
 
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पेटेंट का प्रमाण पत्र लेते डॉ. मयंक सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमेरिका में विकसित नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को भारत में पेटेंट संरक्षण मिल गया है। मिर्जापुर निवासी डॉ. मयंक सिंह और उनकी अमेरिकी वैज्ञानिक टीम ने यह उपलब्धि हासिल की है। पेटेंट में चयनित सक्रिय पदार्थों की पानी में घुलने की क्षमता 10 गुना से 10 लाख गुना तक बढ़ाने से संबंधित दावे को संरक्षण मिला है। यह तकनीक आधुनिक दवाओं, प्राकृतिक औषधियों, पौष्टिक उत्पादों, खाद्य एवं पेय पदार्थों, पशु चिकित्सा तथा कृषि जैसे कई क्षेत्रों में उपयोगी है। 

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अमेरिका के कई उद्योगों को इसका प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी किया जा चुका है। कई वर्षों की जांच के बाद प्रस्तुत 24 तकनीकी दावों में से 18 को भारत में स्वीकृति मिली है। यह तकनीक दवाओं और पौष्टिक पदार्थों की घुलनशीलता बढ़ाकर उनके प्रभावी उपयोग में सहायक होगी।

इस आविष्कार की पेटेंट यात्रा जून 2021 में अमेरिका से शुरू हुई थी। डॉ. मयंक सिंह ने इस तकनीक की क्षमता को भारत की औषधि-निर्माण व्यवस्था से जोड़ा। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारत में आवेदन दाखिल किया गया। मुंबई स्थित पेटेंट नियंत्रक द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई। अंततः 28 अगस्त 2026 को इस पेटेंट की स्वीकृति भारत सरकार के आधिकारिक पेटेंट जर्नल में प्रकाशित हुई।

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तकनीक का महत्व और उपयोग
डॉ. मयंक और उनकी टीम ने इस बहुआयामी नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को "सुप्राप्लेक्स" नाम दिया है। यह डेंड्रिटिक संरचना पर आधारित है। कई दवाएं और प्राकृतिक औषधीय पदार्थ पानी में आसानी से नहीं घुलते। इससे शरीर में उनकी उपलब्धता कम हो जाती है। यह तकनीक सक्रिय पदार्थ की घुलनशीलता और शरीर में उपलब्धता बढ़ाती है। इससे कम मात्रा में भी अधिक प्रभावी उपयोग संभव होता है।

मिर्जापुर से अमेरिका तक का सफर
डॉ. मयंक मूल रूप से मिर्जापुर जिले के चुनार तहसील के बगहीं गांव के निवासी हैं। उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से फार्मेसी की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद से फार्मास्युटिकल साइंस एवं प्रौद्योगिकी में पीएचडी की है। डॉ. मयंक अमेरिका स्थित नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर में प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक हैं।
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