तकनीक का महत्व और उपयोग
डॉ. मयंक और उनकी टीम ने इस बहुआयामी नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को "सुप्राप्लेक्स" नाम दिया है। यह डेंड्रिटिक संरचना पर आधारित है। कई दवाएं और प्राकृतिक औषधीय पदार्थ पानी में आसानी से नहीं घुलते। इससे शरीर में उनकी उपलब्धता कम हो जाती है। यह तकनीक सक्रिय पदार्थ की घुलनशीलता और शरीर में उपलब्धता बढ़ाती है। इससे कम मात्रा में भी अधिक प्रभावी उपयोग संभव होता है।
मिर्जापुर से अमेरिका तक का सफर
डॉ. मयंक मूल रूप से मिर्जापुर जिले के चुनार तहसील के बगहीं गांव के निवासी हैं। उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से फार्मेसी की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद से फार्मास्युटिकल साइंस एवं प्रौद्योगिकी में पीएचडी की है। डॉ. मयंक अमेरिका स्थित नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर में प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक हैं।