अहरौरा। मुहर्रम की नौवीं व दसवीं तारीख को इमाम हुसैन की शहादत में मनाए जाने वाला यौमे आसुरा का ताजिया कसीदा कारी का उत्कृष्ट नमूना है। देश में इस तरह के ताजिये का निर्माण मात्र अहरौरा के ही कलाकारों को ही हासिल है। जिनके अथक परिश्रम से पन्नी पर छोटे-छोटे औजारों की सहायता से खोदामा खोदकर नक्काशी की जाती है। नक्काशी की इस कला को अभ्रक के सहारे आग की गर्मी देकर ताजिये पर पेस्टिंग की जाती है। महज ताजिया ही नहीं, बल्कि इसके मिलान की भी परंपरा है।
बताते चलें कि प्राचीन काल से अहरौरा में एक हिंदू ने ताजिये में नक्काशी कला की नींव रखी, जिसे बेनी का ताजिया कहा जाता है। नगर क्षेत्र में इस कला से कुल उन्नीस ताजिये का निर्माण किया जाता है।
अहरौरा में कुल 49 ताजिया इमाम चौक पर बैठाए जाते हैं। परंपरा के अनुसार बूढादेई में इस ताजिये का मिलान आतिशबाजी की रोशनी में किया जाता है। रांगा की थपकी पर हथौड़ी-छेनी द्वारा छोटे-छोटे औजारों की मदद से खोदामा खोदकर टोगरा की नक्काशी की जाती है। इसी कसीदा कला की जीवंतता बनाए रखने वाले टिकरा खरंजा मुहल्ला के मोहम्मद इश्तिहाक ने बताया कि औव्वल कलमा की सहायता से मस्जिद व मीनार, बिस्मिल्लाह हीर्रहमाने रहीम की सहायता से मस्जिद का दरवाजा, मुसलमान के दिल में टोगरा तथा कलमा पंजतन पाक का नक्शा शामिल है। इसके अलावा कूफा का जंगें मैदान भी अपनी कहानी बयां करेगा, जिसकी कला काबिले तारीफ है।
जोगियान मुहल्ला के कारीगर मोहम्मद मुख्तार ने इंडोनेशिया मस्जिद कलाम तथा बेलाग
का मेहराब ताजिये में खोदकर कसीदा कला को जीवंतता प्रदान किया है।