मिर्जापुर। पितरों के तर्पण के लिए पितृ पक्ष पखवारा बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। पितरों का श्राद्ध करना जरूरी माना गया है। पितृपक्ष का आरंभ गुरुवार से हो रहा है लेकिन जिनके पुर्वजों का निधन अमावस्या को हुआ था। उन्होंने बुधवार को पिंडदान किया।
पुराणों में कहा गया है कि मनुष्य के मृत्यु के बाद विधिपूर्वक श्राद्ध व तर्पण न करने पर उस मनुष्य को मुक्ति नही मिलती उसकी आत्मा शांति के लिए संसार में भ्रमण करती रहती है। पंडित नितिन अवस्थी ने बताया कि पितृ पक्ष के अलग अलग तिथियों पर पितरों को प्रसन्न करने की विधि पुराणों मे बताई गई है। इस दौरान 15 दिनों तक लोग अपने पितरों को पिंडदान करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा माना गया है कि पिंडदान न करने वालों को पितरों के नाराज होने से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ब्रम्ह वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को पितरों व पूर्वजों को प्रसन्न करना पड़ता है। ज्योतिषियों ने भी कुंडली में पितृ दोष को सबसे बड़ा दोष बताया है। पितरों को शांति व खुश करने के लिए हर वर्ष भाद्र पद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक पितरों का श्राद्घ कर उन्हें प्रसन्न किया जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि के दौरान यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं, जिससे परिजनों से श्राद्घ ग्रहण कर सकें।
श्राद्ध का महत्व
मिर्जापुर। पंडित नितिन अवस्थी ने बताया कि मान्यता है कि पितरों के रुष्ट हो जाने पर मनुष्य के जीवन में कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं। जिसमें अशांति, धन हानि, संतान सुख आदि प्रमुख समस्याएं शामिल हैं। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध से इन बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। श्राद्घ में तिल, गुड़, जौ आदि योग्य ब्राम्हणों को दान करने का अधिक महत्व माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान कौओं को पितरों का रूप माना गया है। कहा गया है कि हमारे पूर्वज कौए के रूप में घरों में आते हैं अगर उन्हें श्राद्घ नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं।