मिर्जापुर। बाबा भोलेनाथ तो औढ़रदानी हैं। नाम मात्र से वे अपने भक्तों पर प्रसन्न फल प्रदान कर देेते हैं। जैसे किसी भिखरी को भीख। बात करें तारकेश्वर महादेव की तो इनकी महिमा तो सिर्फ उनका भक्त ही जान सकता है। तारकेश्वर महादेव के दर्शन व पूजन तो हर मास में किए जाते हैं पर सावन मास के सोमवार को यहां जलाभिषेक से भक्तों को असीम फल प्राप्त होता है।
विंध्याचल के पूरब दिशा में स्थित तारकेश्वर महादेव का जिक्र पुराण में भी किया गया है। मंदिर के समीप एक कुंड स्थित है। माना जाता है कि तराक नामक असुर ने मंदिर के समीप एक कुंड को खोदा था। भगवान शिव ने ही तारक का वध किया था। इसलिए उन्हे तारकेश्वर महादेव भी कहा जाता है। कुंड के समीप ही कई शिवलिंग स्थापित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने तारकेश्वर के पश्चिम दिशा की ओर एक और कुंड और भगवान शिव मंदिर का निर्माण कराया था। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि तारकेश्वर में देवी लक्ष्मी निवास करती हैं। देवी यहां अन्य रुप में देवी सरस्वती के साथ वैष्णवी रुप में निवास करती हैं।
तारकेश्वर महादेव की चौखट पर मांगी गईं मुरादे अवश्य पूरी होती हैं। पुजारी के मुताबिक आठ पीढ़ी यानी आठ सौ वर्ष बाद कोई ऐसा कोई भक्त यहां नहीं जो यह कहता दिखे कि मन की मुराद पूरी न हुई।
तारकेश्वर महादेव मंदिर से ठीक उत्तर मध्य गंगा में एक अन्य मंदिर भी स्थित है। पानी कम रहने पर मंदिर के अवशेष आज भी दिखलाई पड़ते हैं।