मिर्जापुर। स्वतंत्रता आंदोलन पर उपरौध क्षेत्र में सबसे ज्यादा सरगर्मी थी। शिवमूर्ति दूबे, रविनंदन दूबे व राजमणि दूबे ने नौजवानों का संगठन तैयार करके व्यवस्थित तरीके से आंदोलन चलाया। इनका संगठन गोपनीय तरीके से काम करता था। ये नेता कई बार जेल भी गए लेकिन संगठन की मजबूती के चलते आंदोलन की धार कभी कुंद नहीं पड़ी।
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान उपरौध क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने दीवानों ने संगठनात्मक क्षमता के चलते युवाओं आजादी की लड़ाई के लिए गोलबंद किया। सन 1936 से लालगंज-हलिया के युवाओं के सहयोग से क्षेत्र में छोटी-छोटी सभाएं करके लोगों के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के प्रति जोश भरा करते थे और जनता को आजादी के प्रति जागरूक किए। शिवमूर्ति दूबे लालगंज के पतुलिकी गांव निवासी थे जबकि रविनंदन दूबे कठवार के। वर्ष 1939 में एक बड़ी सभा लालगंज के पड़ाव मैदान में आयोजित किया गया, जिसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने शिरकत किया था। इस ऐतिहासिक सभा के बाद उपरौध क्षेत्र में आजादी की लड़ाई के प्रति लोगों में जुनून सा पैदा हो गया था। शिवमूर्ति दूबे के निकट सहयोगी रविनंदन दूबे ने जिले स्तर पर सभाएं आयोजित कराने का संकल्प लिया। बसेड़ा गांव के राजमणि दूबे ने आंदोलनों में बढ़चढ़ कर गिहस्सा लेना शुरू किया। शिवमूर्ति दूबे ने सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य गांवों में युवाओं को आजादी की लड़ाई के लिए तैयार किया। शिवमूर्ति दूबे, रविनंदन दूबे एवं राजमणि दूबे उनके अन्य साथीकई बार जेल भी गए।
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अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज की बुलंद
मिर्जापुर। शिवमूर्ति दूबे के नेतृत्व में बने गोपनीय संगठन में लालगंज के बहुलार गांव निवासी केदार नाथ मालवीय, बसेड़ा गांव के राजमणि दूबे, रामपुर अतरी के केदार नाथ त्रिपाठी, महुलरिया गांव के सैठोले कोल आदि ने भी आजादी की लड़ाई में अपनी अहम भूमिका निभाई। संगठन में शामिल सभी आजादी के दीवानों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बिगुल फूंका और मरते दम तक देश के लिए सच्चे मन से योगदान दिया। उस समय इन दोनों लोगों की पहचान एक क्रांतिकारी युवा के रूप में पहचान होती थी। अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध आवाज बुलंद करने में सभी ने अहम भूमिका निभाई और कभी अंग्रेजों के सामने झुकने का काम नहीं किया।