चुनार। तहसील क्षेत्र में पाए जाने वाले बलुआ पत्थर को बौद्धिक संपदा अधिकार में शामिल किए जाने से यह काशी क्षेत्र का 11वां जीआई पंजीकृत उत्पाद हो गया है। स्थानीय शिल्पियों में उम्मीद जगी है कि इससे इस प्राकृतिक उत्पाद को अब सही मायने में संरक्षित किया जा सकेगा।
शिल्पियों को लग रहा है कि पहले की अपेक्षा उन्हें अब काम और दाम दोनों का लाभ बेहतर मिलेगा। यह बलुआ पत्थर जिले के चुनार तहसील क्षेत्र अंतर्गत शेरवा, धूरिया, जिगना, सोनपुर, सरिया बैरमपुर, समुदवा, जम्हवा जमती आदि स्थानों पर स्थित खदानों में भारी मात्रा में पाए जाते हैं। इस बलुआ पत्थर से प्रतिमाएं, जाली, रोशनदान चौखट, रेलिंग इत्यादि को बनाया जाता है। इस बलुआ पत्थर की विशेषता यह है कि काफी समय बीत जाने के बाद भी चमक बरकरार रहती है साथ ही इस पत्थर पर लगे दाग अन्य पत्थरों की अपेक्षा जल्दी छूटते हैं। क्षेत्र में मांग कम होने के कारण यहां के शिल्पियों को दूसरे प्रदेशों में जाकर मजबूरी में इसी बलुआ पत्थर पर नक्काशी आदि का कार्य कर अपना तथा परिवार का जीविकोपार्जन किसी तरह करना पड़ रहा है। इस बलुआ पत्थर का उपयोग विभिन्न जनपदों सहित देश प्रदेश में स्थित तमाम संग्रहालय, पार्कों और इमारतों में किया गया है। वर्तमान समय में इस बलुआ पत्थर का बेहतर लाभ दूसरे जनपदों सहित राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों के बड़े कारोबारी ले रहे है लेकिन अब यहां का बलुआ पत्थर जीआई पंजीकृत उत्पाद होने से तहसील क्षेत्र और चुनार के शिल्पियों को एक नया आयाम मिलने की संभावना अति प्रबल हो गई है। जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री डा. रजनीकांत ने बताया कि अब इस उत्पाद पर मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली का कानूनी अधिकार है। अब यहां से निकलने वाले बलुआ पत्थर को चुनार बलुआ पत्थर कहा जाएगा।