मिर्जापुर। शैल चित्र हजारों साल पुरानी सभ्यता के दर्पण हैं। जबतक आम आदमी स्वयं सक्रिय नहीं होगा और दूसरों को सक्रिय नहीं करेगा तब तक शैल चित्रों का संरक्षण संभव नहीं होगा। सरकार या वन विभाग हर जगह हर समय नजर नहीं रख सकता है। ये बातें डा. चंद्रमोहन नौटियाल ने शुक्रवार को जिला पंचायत सभागार में आयोजित कार्यशाला में कहीं। इसमें सोन तथा बेलन घाटी में शैल चित्र के संरक्षण पर चर्चा की गई।
इस दौरान मुख्य अतिथि व जिलाधिकारी विमल कुमार दुबे ने शैल चित्रों के संरक्षण पर बल दिया। डा. नौटियाल ने कहा कि सोन और बेलन घाटी में हजारों शैल चित्र हमारी धरोहर हैं। इनमें उस समय के पशुओं, अनुष्ठानों तथा आखेट करते हुए चित्र हैं। शैल चित्रों से उस समय के जनजीवन के बारे में पता चलता है। यद्वपि भारत में पिछले 140 वर्षो से शैल चित्रों का अध्ययन हो रहा है। देश के अनेक प्रदेशों में संस्था की ओर से शैल चित्रों के अभिलेखन का काम बडे़ पैमाने पर शुरू किया गया है। डा. शिवशंकर पांडा ने कहा कि जिन चित्रों को धुआं जैसी चीजों से नुकसान पहुंचता है, उन्हें ठीक करने का प्रयास किया जाना चाहिए। मुख्य वन संरक्षक प्रभाकर द्विवेदी ने कहा कि विभाग अपने विभिन्न वन संरक्षण समितियों के माध्यम से ग्राम स्तर पर जागृति फैलाने का प्रयास कर रहा है। डा. जितेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि मिर्जापुर की संस्कृति बहुत पुरानी है। इसंजय माथुर ने इस अवसर पर फिल्म के माध्यम से शैल चित्रों के संरक्षण के बारे में जानकारी दी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के टीके प्रवीण ने बताया कि संस्था देश के सभी प्रदेशों में इस तरह के अभिलेखन तथा जन चेतना कार्यक्रम संचालित कर रही है। दल में बीएचयू के सत्य प्रकाश भी थे।