मिर्जापुर। सरकार चाहे किसी की भी हो थानों से कारखासी की परंपरा को समाप्त करना इतना आसान नहीं दिख रहा। सनोज हत्याकांड में शामिल कछवां थाने के सिपाही की भूमिका कुछ इस ओर ही इशारा कर रही है । पूरे प्रकरण को पशु तस्करी से जोड़ कर देखा जा रहा है। वसूली को ही लेकर वादविवाद बढ़ा और गोली चल गई, जिससे सनोज की जान चली गई।
दस दिन पूर्व अहरौरा के मीरापुर निवासी सनोज की मड़िहान स्थित बेदउर के जंगलों मे गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। परिजनों ने मामले में पुलिस पर लीपापोती का आरोप लगाते हुए हत्या में शामिल पुलिस कर्मियों को बचाने का आरोप लगाया था। पूरा मामला राजनीतिक गलियारों में तैरना शुरू हुआ और हाय तौबा मचने लगा तो पुलिस महकमे के उच्चाधिकारियों के कान खड़े हुए और आनन फानन में अहरौरा थानाध्यक्ष प्रवीण सिंह के साथ ही सिपाही धरफ्मपाल और कछवां थाने मे तैनात सिपाही श्रीनिवास को सस्पेंड कर दिया गया। क्षेत्र में यह चर्चा अभी भी बनी हुई है कि आखिर कैसे कोई सिपाही ट्रांसफर होने के दो माह बीत जाने के बाद भी सरकारी आवास का दुरुपयोग कर रहा था और पोस्टिंग वाले थाने से हमेशा उसका आना जाना लगा रहता था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूर्व की सपा सरकार में भी श्रीनिवास जिले की सबसे मलाईदार कहे जाने वाला अहरौरा थाने की कारखासी किया करता था,और ट्रांसफर होने के बाद भी उसका अक्सर ही कारखासी के सिलसिले में आना जाना लगा रहता था । मजे की बात यह रही की एसपी के रोक लगाने के बाद भी पुलिस तो पुलिस प्राइवेट लोग भी वसूली में मशगूल रहते थे । जिसके परिणाम स्वरूप सनोज हत्याकांड के पूरे प्रकरण को जोड़ कर देखा जा रहा है। अगर वास्तव में थानों से कारखासी के सिस्टम पर अंकुश लग गया होता तो आज शायद सनोज की हत्या ही नहीं हुई होती ।यहीं कहा जा रहा है धर्मपाल भी कारखास था। यहीं नहीं अहरौरा का एक विश्वकर्मा भी पुलिस का निजी कारखास बताया जा रहा है।